“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में- भाग - 7.. आज नाटक “बी -7”

नाटक “बी -7 ‘भूमंडलीकरण’, निजीकरण और बाजारवाद पर प्रहार है . सात पक्षियों के समूह ने अपने आप को पृथ्वी का श्रेष्ठ प्राणी समझने वाले मनुष्य की सोच पर तीखा व्यंग करते हुए ‘पृथ्वी’ को उसके प्रकोप से बचाने की बात कही है . पक्षी मनुष्य की ‘विकास’ संकल्पना को सिरे से खारिज़ करते हुए उसे मनुष्य की विनाश लीला बताते है ... “मनुष्य विकास के नाम पर अपनी कब्र खुद खोद रहा है” .. जंगल में रहने वाला ‘आदिवासी’ पक्षियों को महानगरों में रहने वाले ‘बुद्धिजीविओं’ से ज्यादा प्रगतिशील और ‘बुद्धिमान’ लगता है . ‘आदिवासी’ की दृष्टि सर्वसमावेशी और प्रगतिशील है जबकि दुनिया के तथाकथित महानगरीय ‘बुद्धिजीवी’ ढपोर शंख हैं  ! जर्मनी , यूरोप और भारत में अंग्रेजी , जर्मन और हिंदी में प्रयोग !
B –7:

The play B-7 depicts the story of 7 birds that are facing a threat for their survival. The birds decide to form a fact-finding committee to list out the threats to their survival. This way they enter in the human world and expose the reality of today’s world. How the children are being deprived from their childhood and how the globalization “Who are you to decide about us” is affecting the children in the world. In the end the birds committee suggest the world to save childhood and humanity. This was premiered in Germany. It is being performed in English, Hindi & German.

Premier in English – 7 SEPTEMBER, 2000 AT UNESCO AUDITORIUM IN HANNOVER ,GERMANY
प्रथम मंचन – 18 जनवरी ,2001 – पृथ्वी थिएटर , मुंबई  
औपनिवेशिक और पूंजीवादी देशों ने दुनिया को लूटने के लिए जब ‘भूमंडलीकरण’ के अस्त्र का उपयोग किया तब “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने अपने नाटक ‘बी -7’ के माध्यम से उसका पुरज़ोर विरोध किया . जो देश इसके पैरोकार हैं उन्ही देशों में इस नाटक के प्रयोग हुए . इस नाटक को अभिनीत भी उन कलाकारों ने किया जो अपने शोषण के खिलाफ़ संघर्ष कर अपने हक़ हासिल कर चुके थे ... ये सभी कलाकार ..बाल मजदूरी की चक्की में पिस रहे थे . “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने इन बच्चों में चेतना जाग्रत कर उन्हें ‘शिक्षा’ के अधिकार के लिए उत्प्रेरित किया . जब मराठी रंगभूमि के एक समीक्षक ने नाटक देख कर पूछा था “इन्ही कलाकारों” को आपने वैश्विक स्तर पर इस नाटक के मंचन के लिए क्यों चुना ? तब मेरा जवाब था ‘औपनिवेशिक चिंतन पर बने ड्रामा संस्थान के अभिनेता अपना पेट भरने के लिए .. अपने हुनर का उपयोग करते हैं ... उनमें ये चिंतन नहीं है की ‘नाटक’ सार्थक बदलाव लाता है . और व्यावसायिक रंगभूमि में कोई एक भी कलाकार आप बताइए जो इन कलाकारों से बेहतर ‘अभिनय’ करे तो उसको हम तुरंत इस नाटक में भूमिका देगें”
ये वाकया आपके साथ इसलिए साझा कर रहा हूँ ताकि ये सनद रहे की  ‘भूमंडलीकरण’ की स्वीकार्यता मध्यम वर्ग की बैशाखी से फलीभूत हो रही है ... ये मध्यम वर्ग ‘भूमंडलीकरण’ में अपना मोक्ष खोज रहा है ... विकास की मृगतृष्णा का शिकार है ..जो दिन रात जल , जंगल और ज़मीन को उजाड़ रहा है ..यहाँ तक की अब तो ‘पृथ्वी’ का बुखार भी बढ़ रहा है ... पर ‘मध्यम वर्ग इस पूंजीवादी ‘विकास’ की माला जप रहा है .... नाटक ‘बी -7’ इसी ‘विकास’ की और ‘भूमंडलीकरण’ की साज़िश को बेनक़ाब करता है !
जी-8 पर कटाक्ष है नाटक ‘बी-7’... जो सात पक्षियों के माध्यम से अपने कथ्य को बहुत मनोहारी और कलात्मक  रूप में दर्शकों के सामने रखता है ...

उम्मीद है आप सब को रंग साधना के यह पड़ाव नई रंग प्रेरणा दे पाएं...
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थिएटर ऑफ रेलेवेंसनाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन वैश्विक स्तर पर कर रहे हैं. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस रंग सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म निर्देशक और अभिनेता केन्द्रित होने की बजाय दर्शक और लेखक केन्द्रित हो क्योंकि दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है.
पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए कला कला के लिएके चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं . थिएटर ऑफ़ रेलेवंस ने कला कला के लिएवाली औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के चक्रव्यहू को अपने तत्व और सार्थक प्रयोगों से तोड़ा (भेदा) है और दर्शकको जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने वाली प्रतिबद्ध ,प्रगतिशील,समग्र और समर्पित रंग दृष्टि से जोड़ा है .
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अपने तत्व और सकारात्मक प्रयोगों से एक बेहतर , सुंदर और मानवीय विश्व के निर्माण के लिए सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध है !




















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