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Classic plays “Garbh” and “Anhad Naad-Unheard Sounds of Universe” along with new play “Nyaya ke Bhanwar me Bhawari” Will be performed to Celebrate 25 years of “Theatre Of Relevance” philosophy "3-days Theatre Festival in Mumbai"

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15, 16, 17 November, 2017 At Shivaji Mandir,Dadar (W) Mumbai
Epoch is created and wrought through contemplation. Contemplation, being generated from within you and crossing global horizons, survives in the world. Art make humans human. Artistic process & reflection alone possesses the capacity of soaking human poison. The period after 1990 has been an era of “Irrelevance” for the world. This has been a period of monopoly and dictatorship. A period of limiting the principles of science to technology alone. Today is the period of buying and selling. A period where media instead of being faithful to the people, is faithful to thy masters & rulers. In these threatening times, the “people” needs ‘contemplation’ for their issues and a platform for their concerns. ‘Theatre of Relevance” theatrical philosophy’ has evolved as a ‘contemplation platform’ for public concerns since 12th August, 1992 and has completed 25 years of its theatrical philosophy on 12th August, 2017. In these 25 ye…

#काल को गढ़ने वाले प्रसिद्ध नाटक “गर्भ” और “अनहद नाद –अनहर्ड साउंड्स ऑफ़ युनिवर्स” और “न्याय के भंवर में भंवरी” के मंचन से सजेगा “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" का 25 वर्षीय मुंबई नाट्योत्सव!

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“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष 15, 16, 17 नवम्बर, 2017 को "मुम्बई में 3 दिवसीय नाट्य उत्सव”
काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और 12 अगस्त,2017 को   अपने ‘रंग दर्शन’  होने के 25 वर्ष पूर्ण कियें है. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों,

Theatre Thinker Manjul Bhardwaj Sculpting University of Life through Theatre - Dhananjay Kumar

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Manjul equips play writers with an avante garde genre. He pulls them closer to the incidental happenings in the society and brings them face to face with the experiences, environment and background of the sufferer; thereon he liberates the writer…
Manjul Bhardwaj’s Theatre of Relevance philosophy breaks through the dimensions of the stage and re-establishes theatre in the accessibility of common man and its implementation in day to day life. His plays are beyond the realm of entertainment, it intrigues, questions, pivots you to your thought processes and invoke you to set your own parameters of rationalising and reassessing your environment, the society. This is Manjul Bhardwaj’s own cultivation.
To celebrate the 25 years of Theatre of Relevance philosophy, 3 days theatre festival and Theatre summit was organised on 10, 11 and 12 august 2017 in New Delhi.

Manjul Bhardwaj commenced his theatrical journey as a usual theatre practitioner. Those days witnessed his passion for theatre and…

थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस का दिल्ली नाट्योत्सव

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थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के दिल्ली नाट्योत्सव ने दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी !
थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस नाट्य दर्शन के सृजन और प्रयोग के 25 वर्ष पूरे हुए. अपने सृजन के समय से ही देश और विदेश, जहां भी इस नाट्य दर्शन की प्रस्तुति हुई, न सिर्फ दर्शकों के बीच अपनी उपादेयता साबित की, बल्कि रंगकर्मियों के बीच भी अपनी विलक्षणता स्थापित की. इन वर्षों में इस नाट्य दर्शन ने न सिर्फ नाट्य कला की प्रासंगिकता को रंगकर्मी की तरह पुनः रेखांकित किया, बल्कि एक्टिविस्ट की तरह जनसरोकारों को भी बार बार संबोधित किया. दर्शकों को झकझोरा और उसकी चेतना को नया सोच और नई दृष्टि दी. इन 25 वर्षों में थिएटर ऑफ़ रेलेवेंस के सृजनकार मंजुल भारद्वाज ने भारत से लेकर यूरोप तक में अपने नाट्य दर्शन के बिरवे बोये, जो अब वृक्ष बनने की प्रक्रिया में हैं. इन 25 वर्षो के सफ़र के माध्यम से मंजुल ने यह भी साबित किया कि बिना किसी सरकारी अनुदान और कॉरपोरेट प्रायोजित आर्थिक सहयोग के बिना भी सिर्फ जन सहयोग से रंगकर्म किया जा सकता है और बिना किसी हस्तक्षेप के पूरी उनमुक्तता के साथ किया जा सकता है. ऐसे में 25 वर्ष पूरे ह…

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य दर्शन के 25 वर्ष : “दिल्ली” में 10,11 और 12 अगस्त 2017 को 3 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस – नाट्य उत्सव’

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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस" नाट्य दर्शन के 25 वर्ष 10,11,12 अगस्त, 2017 को "दिल्ली में 3 दिवसीय नाट्य उत्सव” काल को चिंतन से गढ़ा और रचा जाता है.चिंतन आपके भीतर से सृजित होकर वैश्विक क्षितिज को पार कर विश्व में जीता है.कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. कलात्मक चिन्तन ही मनुष्य के विष को पीने की क्षमता रखता है.1990 के बाद का समय दुनिया के लिए ‘अर्थहीन’ होने का दौर है.ये एकाधिकार और वर्चस्ववाद का दौर है.विज्ञान के सिद्धांतों का तकनीक तक सीमित होने का दौर है. आज खरीदने और बेचने का दौर है. मीडिया का जनता की बजाए सत्ता की वफ़ादारी का दौर है.ऐसे समय में ‘जनता’ को अपने मुद्दों के लिए ‘चिंतन’ और सरोकारों के एक मंच की जरूरत है. ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ रंग सिद्धांत 12 अगस्त,1992 से जनता के सरोकारों का ‘चिंतन मंच’ बनकर कर उभरा है और आज अपने ‘रंग दर्शन’ के होने के 25 वर्ष पूर्ण कर रहा हैं. इन 25 वर्षों में ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ ने गली, चौराहों, गावों, आदिवासियों, कस्बों और महानगरों से होते हुए अपनी वैश्विक उड़ान भरी है और वैश्विक स्वीकार्यता हासिल की है. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के सिद्धांत 1. ऐसा रंगकर्म जिसकी सृजनश…

25 years of “Theatre of Relevance” :3-days Theatre festival in Delhi

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“Theatre of Relevance”-25 years of theatrical philosophy 10, 11, 12 August 2017 "3-days theatre festival in Delhi"

Epoch is created and wrought through contemplation. Contemplation, being generated from within you and crossing global horizons, survives in the world.  Art make humans human. Artistic process & reflection alone possesses the capacity of soaking human poison. The period after 1990 has been an era of “Irrelevance” for the world. This has been a period of monopoly and dictatorship. A period of limiting the principles of science to technology alone. Today is the period of buying and selling. A period where media instead of being faithful to the people, is faithful to thy masters & rulers. In these threatening times, the “people” needs ‘contemplation’ for their issues and a platform for their concerns. ‘Theatre of Relevance” theatrical philosophy’ has evolved as a ‘contemplation platform’ for public concerns since 12th August, 1992 and it is completing 25 years…