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रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए 4 दिवसीय ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ कार्यशाला को उत्प्रेरित करेगें !

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#थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ “हमारा जीवन सुन्दर है !’ 4 दिवसीय #आदिवासी ‘युवाओं और बच्चों’ के लिए नाट्य कार्यशाला 7 -10 मई 2017, चिखलवाड़ी, त्र्यम्बकेश्वर , नासिक उत्प्रेरक : रंगचिन्तक मंजुल भारद्वाज ‘बेचने और खरीदने’ के मन्त्र से चलने वाले इस ‘मुनाफ़ाखोर’ #भूमण्डलीकरण के दौर में मानव ने अपने ‘लालच’ की भूख  को  मिटाने के लिए ‘अंधाधुंध’ #विकास के भ्रमजाल से अपने लिए सबसे बड़ा ‘पर्यावरण’ संकट खड़ा किया है . पृथ्वी ‘मानव’ की जरूरतों को पूरा करने के लिए पर्याप्त संसाधनों से लैस है, पर उसकी ‘लालच’ को पूरा करने के लिए उसके संसाधन ‘सीमित’ हैं . आज के आधुनिक कहलाने वाले पढे लिखे ‘अनपढ़’ समाज की  जीवन शैली की दिशा  ‘बाजारवाद’ तय करता है . ‘बाजारवाद’ की ‘लूट’ को #विज्ञापन एक ‘लुभावन’ सपने के रूप में समाज को परोसता है . विज्ञापन के ‘मुनाफ़ाखोर’ जुमले ‘YOU do not need it, but you want to have it’ समाज का ‘कुतर्क’ मानस तैयार कर रहे हैं जो ‘ज़रूरत’ की निरर्थकता और ‘लालच’ की सार्थकता स्थापित कर रहा है और ऐसे विज्ञापन के ‘जुमले’ लिखने वाले मीडिया में ‘#पर्यावरण’ बचाने की गुहार लगाते हैं . मीडिया में वो ’फ़िल्मी एक्टर ’ बि…

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “राजनीति’ ‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला -रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज

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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “राजनीति’ ‘खेती, किसान,आत्महत्या और डिजिटल इंडिया’
‘अपनी ही ‘खोपड़ी’ लिए खड़ा भारतीय ‘किसान’ और महान भारत का ‘जनमानस’ खामोश क्यों?’ विषय पर नाट्य पूर्वाभ्यास कार्यशाला – पड़ाव -3 उत्प्रेरक – रंग चिन्तक मंजुल भारद्वाज कब : 23 - 27 अप्रैल,2017 कहाँ : युसूफ मेहरअली सेंटर , पनवेल ( मुंबई) सहभागी : वो सभी देशवासी जो स्वयं को लोकतंत्र का पैरोकार और रखवाले समझते और मानते हैं विवरण हमारा जीवन हर पल ‘राजनीति’ से प्रभावित और संचालित होता है पर एक ‘सभ्य’ नागरिक होने के नाते हम केवल अपने ‘मत का दान’ कर अपनी राजनैतिक भूमिका से मुक्त हो जाते हैं और हर पल ‘राजनीति’ को कोसते हैं ...और अपना ‘मानस’ बना बैठे हैं की राजनीति ‘गंदी’ है ..कीचड़ है ...हम सभ्य हैं ‘राजनीति हमारा कार्य नहीं है ... जब जनता ईमानदार हो तो उस देश की लोकतान्त्रिक ‘राजनैतिक’ व्यवस्था कैसे भ्रष्ट हो सकती है ? .... आओ अब ज़रा सोचें की क्या बिना ‘राजनैतिक’ प्रकिया के विश्व का सबसे बड़ा ‘लोकतंत्र’ चल सकता है ... नहीं चल सकता ... और जब ‘सभ्य’ नागरिक उसे नहीं चलायेंगें तो ... बूरे लोग सत्ता पर काबिज़ हो जायेगें ...और वही हो रहा है ... आओ …

रंग चिंतन में समाहित होता है उसका अर्थ संयोजन -मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक

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भाग -१ रंग चिंतन में समाहित होता है उसका अर्थ संयोजन -मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक) भारत देश में भारत सरकार सबसे धनी और सबसे ताकतवर है. उसका अर्थ तंत्र हरेक नागरिक से प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कर से चलता है. यानी सबसे ताकतवर भी नागरिक से मांगकर जीता है. जिसके लिए सरकार वही ‘अर्थ’ का जिम्मेदार . ये सरल आर्थिक नियम और फार्मूला है. हाँ इस सरल बात की व्यवहारिकता की कई उलझन और पेंच है . सरकार किसको कितना  पैसा देती है ..क्यों देती है ...किसलिए देती है ... गरीब को कम ..अमीर को ज्यादा .. हाँ ये व्यवहार गत विवादित पक्ष हैं ..पर ये प्राथमिकताओं और राजनैतिक पक्षधरता का आयाम है. पर ‘अर्थ’ कहाँ से और कैसे संचित हो उस फार्मूले की सरलता जस की तस और स्पष्ट है. सबसे अमीर भारत सरकार को एक गरीबी रेखा से नीचे जीने वाला नागरिक भी उसकी तिजोरी भरता है ..एक माचिस या सुई खरीदने पर भी सरकार को टैक्स देता है .. अमीरों की बात तो सर्वविदित है की वो कैसे सरकार को .... चलाते और लूटते हैं ... जनहित , जन सरोकार तो जनता का आर्थिक सहयोग अनिवार्य है .. टिकाऊ और स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए ! यही सरल बात कलाकारों को समझनी है और य…

“तत्व,व्यवहार,प्रमाण और सत्व” की चतुर्भुज को जो साधता है वो है...क्रिएटर” – मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक )

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कला एक निरंतर खोज है ..और कलाकार एक अविरल खोजी ...विवशता को हम अपना भाग्य मान लेते हैं और विडम्बना को ‘नीयती’ .. और अपने आप को एक पूर्वनिर्मित ‘बक्से’ में या व्यवस्था के पिंजरे में बंद कर लेते हैं .. और उस पिंजरे में अभिशप्त जीवन को अपना लक्ष्य और उस लक्ष्य के पूर्वनिर्धारित कर्मों यानी क्रिया को अपना ‘धर्म’ मान लेते है ... पर जो इस ‘पिंजरे’ के बाहर ..अन्दर .. देख सकता है ..उसको खंगोल सकता है .. इस पिंजरे को तोड़ने का उपाय जानता है ...वो कलाकार है .क्योंकि कलाकार का मतलब है काल का आकार... काल यानी कल ..और कल को आकार देने वाले को कहते हैं ‘कलाकार’... 



वो व्यवस्था ‘गुलाम’ होती है जिसका कलाकार ‘निरीह , असहाय और बेबस हो ... आज भी वही हालात हैं  ... क्योंकि व्यवस्था का ‘हलाहल’ पीने वाला ..स्वयं बेहोश है ..उसके चिंतन और चेतना को .. व्यवस्था के भोगवाद ने ढक लिया है ..वो अपने ‘चिंतन’ को कोमेर्सिअल और प्रोफेशनलिज्म के हाथों बेचकर ‘लुटेरों’ से मुक्ति की आस लगाए बैठें हैं ... ‘लुटेरों’ की लूट की व्यवस्था को ‘विकास’ समझ रहे हैं ..लालच को ‘ज़रूरत’ समझते हैं ... चरखे को पतन और टैंक को मुक्ति का मार्ग …

मानवीय विष को निष्क्रिय करना ही कला का मकसद और साध्य है ! - रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज

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नाटक “अनहद नाद – Unheard Sounds of Universe” नाटक होते हुए भी “जीवन” है और जीवन में घटित “नाटक” को हर पल उखाड़ फैंकता है .. कलाकार की कला , कलात्मकता और कला सत्व है ..उनका सृजन नाद है .. व्यक्तिगत सृजन दायरे को तोड़कर उसे यूनिवर्सल , ब्रह्मांडीय सृजन से जोड़ता है और कलाकार को देश , काल ,भाषा , धर्म से उन्मुक्त कर एक सृजनकार , एक क्रिएटर के रूप में घडता है . "अनहद नाद- Unheard sounds of Universe"... कलात्मक चिंतन है, जो कला और कलाकारों की कलात्मक आवश्यकताओं,कलात्मक मौलिक प्रक्रियाओं को समझने और खंगोलने की प्रक्रिया है।क्योंकि कला उत्पाद और कलाकार उत्पादक नहीं है और जीवन नफा और नुकसान की बैलेंस शीट नहीं है इसलिए यह नाटक कला और कलाकार को उत्पाद और उत्पादिकरण से उन्मुक्त करते हुए,उनकी सकारात्मक,सृजनात्मक और कलात्मक उर्जा से बेहतर और सुंदर विश्व बनाने के लिए प्रेरित और प्रतिबद्ध करता है।

नाटक “अनहद नाद– Unheard Sounds of Universe” में परफॉर्म करना एक चुनौती है . चुनौती बहुआयामी हैं 1. नाटक के तत्वों को समझना ( क्योंकि आज की तथाकथित प्रोफेशनल पीढ़ी के पास इसे समझने का सुर ही नहीं ) 2. न…

Theatre of Relevance “Understanding Politics & Political processes” Workshop By Theatre thinker Manjul Bhardwaj

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Theatre of Relevance “Understanding Politics & Political processes” Workshop from 10-14 Feb.2017 By  Theatre thinker Manjul Bhardwaj At Shantivan, Panvel (Mumbai) Who can participate: All Citizens who thinks they are the custodian of the largest ‘Democracy’ of the world! Brief: Politics influences & dictates  our life every moment , but being a ‘civilized’ citizen we only vote and done away with our political responsibility and rest of the time keep cursing “Politics is dirty , It ‘a game of fraud, goons & cheaters! Politics is not our ‘cup of tea’… because we are civilized? Let’s ponder on this Paradox: How could a democratic political system is corrupt while its citizens are Honest? We are the custodian of the largest ‘Democracy’ of the world. Let`s enhance our political participation beyond as a voter to a changer maker of the rotten ‘Political system’. This system is governed by fraud, goons & cheaters because; we ‘the civilized’ are not participating in the poli…