“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में आज से एक श्रंखला शुरू कर रहे हैं .. आज का नाटक है “दूर से किसी ने आवाज़ दी”

नाटक – दूर से किसी ने आवाज़ दी – बाबरी (मस्जिद) ढांचा ढहाने के बाद मुंबई में भड़के साम्प्रदायिक दंगों के पीछे साज़िश को बेनकाब करते हुए आम जनता से साम्प्रदायिक व राष्ट्रीय एकता की अपील इस नाटक की आत्मा है . ये नाटक भारतीय संविधान के सबसे पवित्र और भारत के अस्तित्व के  लिए आधारभूत सिद्धांत ‘सेकुलरवाद’ का पैरोकार है !
DOOR SE KISINE AWAAZ DI:
Written after the Bombay riots of 1992-1993, this play is a plea for communal, as well as a scathing indictment of a system where opportunists manipulate religious sentiments for political ends. Eventually it is common man who becomes helpless pawn in the unscrupulous machinations of power of politics. This play has been performed successfully more than 1000 times on stage as well as on street.

प्रथम मंचन 26 जनवरी 1993
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत की अग्निपरीक्षा का समय भी एक वर्ष के भीतर ही आ गया। मुम्बई/ देश साम्प्रदायिक दंगों की आग में झुलस गया’ - युवा नाट्य कर्मियों ने बड़ी लगन और मेहनत से मुम्बई के चप्पे - चप्पे पर जाकर नाटक खेला दूर से किसी ने आवाज़ दी। मुझे याद है वो दिन जब अपने रंगकर्मियों को सफ़ेद कुर्ता देते हुए कहा था ये है अपना कफ़न। चार घन्टे तक चली गर्म - सर्द बहस के बाद हर कलाकार अपने-अपने घर गया और अगले दिन तय समय पर नाटक खेलने पहुँच गया।
दंगो की नफरत व घावों को रंगकर्म ने प्यार और मानवीय ऊष्मा का एहसास दिया। मेरे मन में हर वो कलाकार सांस लेता है जिसने अब तक निःस्वार्थ अपने तन, मन, धन से इटीएफ के क्रियाकलापों में रचनात्मक योगदान दिया है या दे रहे हैं।
उम्मीद है आप सब को रंग साधना के यह पड़ाव नई रंग प्रेरणा दे पाएं

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थिएटर ऑफ रेलेवेंसनाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन वैश्विक स्तर पर कर रहे हैं. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस रंग सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म निर्देशक और अभिनेता केन्द्रित होने की बजाय दर्शक और लेखक केन्द्रित हो क्योंकि दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है.
पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए कला कला के लिएके चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं . थिएटर ऑफ़ रेलेवंस ने कला कला के लिएवाली औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के चक्रव्यहू को अपने तत्व और सार्थक प्रयोगों से तोड़ा (भेदा) है और दर्शकको जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने वाली प्रतिबद्ध ,प्रगतिशील,समग्र और समर्पित रंग दृष्टि से जोड़ा है .
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस अपने तत्व और सकारात्मक प्रयोगों से एक बेहतर , सुंदर और मानवीय विश्व के निर्माण के लिए सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध है !









Comments

  1. We need more of individuals like manjulji....who are working at grassroot level for awareness among masses for various social issues...
    He and his team has dedicated their life for this cause..hope u reach billions all around the world....and inspire more individuals...

    From:A small voice who really appreciate their work...

    ReplyDelete
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