थिएटर ऑफ रेलेवेंस – नाट्य कार्यशाला


थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य कार्यशाला
हमारी पहचान, हमारी भूमिका
-----मंजुल भारद्वाज        
चण्डीगढ़ के सेक्टर 42 स्थित स्नातकोत्तर सरकारी कन्या महाविद्यालय में 12 नवंबर से 21 नवंबर 2011 तक 10 दिवसीय थिएटर ऑफ रेलेवेंसहमारी पहचान, हमारी भूमिका’  नामक एक नाट्य कार्यशाला का आयोजन किया गया. हमारी पहचान,हमारी भूमिका नामक इस कार्यशाला को उत्प्रेरित किया रंगकर्मी मंजुल भारद्वाज ने. कार्यशाला बड़ी ही अनूठी और अनोखी रही, क्योंकि इस कार्यशाला में सहभागियों ने ऎसे मुद्दों को छुआ, जो उनके शैक्षणिक जीवन में अछूते रहे, मसलन-शिक्षा क्यों? किसके लिए? शिक्षा पद्धति और उद्देश्य? यानी लॉर्ड मैकाले की नौकर बनाने की पद्धति को उलटकर स्वयं की प्रतिभा को खोजने की प्रक्रिया शुरू हुई.
सबसे  पहले एक व्यक्ति पर आश्रित कर देने वाली बैठनेवाली व्यवस्था को बदला गया, और ऎसे तरीके को अमल में लाया गया, जहाँ हर एक सहभागी; सहभागी हो सके, इसलिए गोलाकार बैठने की पद्धति को अपनाया गया. दूसरा प्रहार मैकाले पद्धति पर हुआ कि पढ़ाने वाला तय नहीं करेगा कि विद्यार्थी क्या पढ़ेंगे? बल्कि विद्यार्थी तय करेंगे कि क्या पढ़ना है? और कैसे पढ़ना है? इसी क्रम में प्रश्न सामने आया कि हम क्या चाहते हैं कार्यशाला से? इस प्रक्रिया ने आत्म अन्वेषण की प्रक्रिया का सूत्रपात किया. प्रश्न से प्रतिप्रश्न निकलना शुरू हुआ, उत्तर आने शुरू हुए- आत्मविश्वास बढ़ाना है, अभिनय सीखना है. बाकी यह मनोभाव उभरा कि स्पष्ट नहीं हैं सहभागी कि वह क्या करना चाहते हैं?
इस प्रक्रिया  में एक और प्रश्न सामने  आया-यह कार्यशाला किसकी  है? और चर्चा के बाद पहला निर्णय हुआ- यह हमारी कार्यशाला  है.तो क्या होगा कार्यशाला में,इसका निर्णय कौन करेगा? पहली बार, सहभागियों ने अपने शैक्षणिक अनुभव में स्वयं और सामूहिक निर्णयलेने की प्रक्रिया का अनुभव किया और इसे पूरी कार्यशाला की अवधि के दौरान अपनाया. यानी, खुद सीखो,खुद से सीखो,एक दूसरे से मिलकर सीखो और सिखाओ.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य पद्धति की विशेषता है कि वो स्वाभाविक  रचनात्मक मानवीय प्रक्रियाओं  से व्यक्ति, समूह और समाज को जोड़ती है. इसलिए प्रश्न उभरा- हममें आत्मविश्वास क्यों नहीं है? क्यों हम अपना निर्णय नहीं ले सकते? क्यों अपने मन की बात सबके सामने नहीं बोल सकते? एक छात्रा ने उत्तर दिया-मुझे कहा गया है- मैं चुप रहूँ. मुझे सिखाया गया है- मैं एक लड़की हूँ.इस मनोभाव के बाद प्रश्न उठामेरी पहचान क्या है? हमारी पहचान क्या है? क्या मैं सिर्फ एक लड़की हूँ? या इस जैविक तथ्य के अलावा मेरी कोई पहचान है? मेरा कोई वजूद, कोई अस्तित्व है? इस प्रक्रिया ने सहभागियों को स्वयं से रूबरू करवाया. उनके शरीर के सामने उनकी प्रतिभा को ला खड़ा किया. जो छात्राएँ अबतक अपने शरीर के इर्द-गिर्द पढ़ती, सीखती और जीवन जीती आईं थीं,उनके शरीर के बन्धनों और बेड़ियों को तोड़कर उनके दिल और दिमाग में अस्तित्व का प्रश्न उपस्थित किया या कहें अस्तित्व की खोज के लिए प्रेरित किया.
परत दर परत खुलते आयामों में तय हुआ और सहभागियों ने समझ बनाई- हाँ, हमें खुशी है कि हम लड़की हैं, लेकिन हम नहीं चाहते कि केवल लड़की का यह शरीर हमारी पहचान बने. मैं शरीर में रहती हूँ, लेकिन मात्र शरीर मेरी पहचान नहीं है. मैं मात्र महिला नहीं हूँ. एक इंसान हूँ. और इंसान के रूप में हमारी पहचान ही हमें स्वीकार्य है. सहभागियों के इस निर्णय ने पितृसत्ता और लिंग असमानता के विषय को समझने के लिए सभी को प्रेरित किया. सांस्कृतिक चेतना की निर्माण-प्रक्रिया में आशंका, पूर्वाग्रह, दृष्टि, सृष्टि, दिशा, संवेदना, अहसास, पहचान, रुकावट, शोषण, अत्याचार, कुप्रथा, संस्कार, संस्कृति, द्वंद्व, नवनिर्माण, परम्परा, पद्धति, परिवर्तन, समाज, परिवार, व्यक्ति, समूह सब जीवित हो उठे. और थिएटर ऑफ रेलेवेंस प्रक्रिया में विचरण करने लगे.
एक-एक मुद्दे के हर आयाम को विस्तार से विश्लेषित किया कि कौन  से तत्व लिंग असमानता, कुप्रथा, रूढ़िवाद, हिंसा, और अन्याय को बढ़ावा देते हैं और कौन  से तत्व समानता, मानवता और न्यायप्रिय समाज का निर्माण करते हैं. बदलाव की इस प्रक्रिया में सबसे पहले बुलंद हुआ कमला भसीन का एक गीत-तू खुद को बदल, तू खुद को बदल, तब ही ज़माना बदलेगा.थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य पद्धति सहभागियों में रचनात्मक-कलात्मक चेतना जगाती है.इसलिए दूसरे या बाहरी तत्व को ही विध्वंसक या शोषण प्रवृतियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराती, बल्कि स्वयं से बदलाव की प्रक्रिया शुरू करने का आवाहन करती है.
छात्राओं  ने स्वयं को बदलने का सूत्र  अपने हाथ में लिया और स्वयं  के नेतृत्व- गुण को पहचाना. अपने शारीरिक, वैचारिक, आत्मिक और भावनात्मक स्थान (स्पेस) को पहचाना और नकारात्मक ऊर्जा को सकारात्मक ऊर्जा में तब्दील कर अपना नज़रिया बदला. और नारा बुलंद किया-यह जगह मेरी है, मैं हूँ.तालियों की लयबद्धता, आवाज में जोश, दिल में उमंग लेकर छात्राओं ने खुद में बदलाव का निर्णय लेकर कॉलेज कैम्पस के बाहर क़दम रखा और सार्वजनिक स्थल (पब्लिक स्पेस) पर अपने बदलाव के अनुभव को कलात्मकता के सोच के साथ नाट्य रूप में आम जनता के समक्ष अभिव्यक्त किया.
प्रदर्शन के लिए इन छात्राओं ने उसी जगह को चुना,जहाँ से वे भागती थीं. लड़के छेड़ते थे,फब्तियाँ कसते थे. कोई देख रहा है ! हाय, लोग क्या कहेंगे ! और ज़िदा होते हुए भी बेजान व्यक्तित्व की तरह रोज़ वहाँ से गुजरती रहीं थीं. लेकिन आज इस जगह से वे भाग नहीं रहीं हैं ! आज वे भीड़ का हिस्सा नहीं हैं ! आज भीड़ उनके लिए है! भीड़ उन्हें देखने आई है! आज उन्होंने कहा है-यह जगह मेरी है, हमारी है. दर्शकों ने उनके निर्णय, निश्चय और प्रतिभा को सराहा. और सबसे बड़ी बात, युवा लड़के, जो उनको कलतक केवल एक लड़की का शरीर समझते थे, आज खड़े होकर उनको एक प्रतिभा सम्पन्न व्यक्तित्व के रूप में महसूस कर रहे थे! घरों से झाँकते बहुत से दर्शकों की आँखें छलछला आईं ! कलाकारों की व्यक्तिगत अनुभूति-अभिव्यक्ति सामूहिक बन गई! और जब व्यक्तिगत अनुभव-अभिव्यक्ति सामूहिक अनुभव और अभिव्यक्ति में बदलती है, तो कलाका निर्माण होता है. थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य पद्धति इस तरह कला को जीवन से जोड़ती है.
इस कलात्मक  और उन्मुक्त कर देनेवाले विजय-भाव  के बाद छात्राओं ने मंथन किया कि नारी मुक्ति या उसकी उपलब्धियाँ मात्र प्रतीकात्मक हैं, जैसे इस देश की राष्ट्रपति महिला हैं, प्रधानमंत्री महिला रही हैं, तो क्या भारत की बाकी आधी आबादी भी उन्मुक्त है? क्या वह निर्णय लेती हैं? क्या उनको इंसान समझा जाता है? नारी मुक्ति की नायिका सावित्री बाई फूले हैं या मिस वर्ल्ड?
सहभागियों ने निष्कर्ष निकाला कि नारी को शरीर तक सीमित करने की बाज़ार की साज़िश का प्रतीक है-मिस वर्ल्ड. और शरीर के बाहर नारी के अस्तित्व की पहचान  का नाम है-सावित्रीबाई  फूले.
इस स्पष्ट समझ के बाद प्रश्न उभरा- यह पहचान बनाने के लिए  हमारी भूमिका क्या हो? स्वयं  की भूमिका, परिवार की भूमिका या परिवार बनाने में हमारी  भूमिका, अपने सपनों का परिवार, हमारे सपनों का समाज, इन विषयों पर सहभागियों ने स्वयं  नाटक लिखे और कार्यशाला में  प्रस्तुत किए. स्वयं के अधिकार की हुंकार उन्होंने अभिव्यक्त की-साढा हक़ इथे रख.लेकिन अतिव्यक्तिवाद से उन्होंने किनारा किया,जैसे आज बदलते परिवेश में सिकुड़ता परिवार, अपनी नाट्य-प्रस्तुति में उन्होंने दिखाया कि हम अपने परिवार में दादा-दादी को गायब नहीं होने देंगे.
महिला निर्णय ले या पुरुष,इस बहस या व्यक्तिगत सर्वोच्चता के बजाय मिलकर जवाबदारी तय करने और सामूहिक निर्णय लेने की प्रक्रिया पर बल दिया. इसमें छात्राओं ने स्वयं को आगाह किया कि बाज़ार हमारी भूमिका तय नहीं कर सकता. मसलन, केवल बाल कटी महिला ही अच्छी उद्यमी हो सकती है, कॉरपोरेट जगत को संभाल सकती है, बाज़ार के इस भ्रम को तोड़ने के लिए उन्होंने कहा कि पूरे बाल या भारतीय परिधान वाली महिला में भी उच्च कोटि का प्रबंधन कौशल्य और क्षमता है. इसका उदाहरण उन्होंने चन्दा कोचर के रूप में दिया. मीडिया को भी छात्राओं ने विश्लेषित किया और स्पष्ट किया कि हम 24 घंटे मिस वर्ल्ड को कब बच्चा होने वाला है या उसकी गोदभराई की रस्म की खबर नहीं देखना चाहते. हम मीडिया की सार्थक और रचनात्मक भूमिका चाहते हैं.
थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य-पद्धति इस तरह मानवीय रचनात्मक दृष्टि का निर्माण करती है. इस दृष्टि निर्माण से मनुष्य बेहतर  होने की ओर प्रेरित होता है. अपने आत्मविश्वास, निर्णय लेने की क्षमता, जीवन दृष्टि और उसका उद्देश्य, और सृजनशीलता का आधार लेकर छात्राओं ने मंच क्या है? नाटक क्या है? दर्शक की भूमिका, अभिनय के सूत्र, नाट्य-लेखन प्रक्रिया और सूत्र, निर्देशन और नाट्य प्रस्तुति को समझा और थिएटर ऑफ रेलेवेंस नाट्य सिद्धांत और प्रक्रियाओं को आत्मसात किया.
रचनात्मक दृष्टि और अनुभव से लबरेज़ इन 60 नाट्य कलाकारों ने चार नाट्य- प्रस्तुतियाँ कार्यशाला के अंतिम दिन कॉलेज के प्रांगण में अपने ही कॉलेज के हज़ारों छात्राओं और प्राध्यापकों के सामने प्रस्तुत कर सबको सुखद आश्चर्य से भर दिया. नाट्य विषय का चुनाव, लेखन, अभिनय, निर्देशन,रंग-शिल्प आदि सारी जिम्मेदारियों का निर्वहन कलाकारों ने स्वयं किया. नाट्य कार्यशाला को उन्होंने एक स्वरचित गीत से अभिव्यक्त किया. गीत का संगीत भी इन्हीं कलाकारों ने रचा. गीत है- 
मिली  है दिल के अरमानों  को एक न उड़ान है,
मिलकर बनाया है हमने एक नया जहान है.
नई  दिशा मिली यहाँ,
ज़िन्दगी जी ली यहाँ,
पूरा  किया ख्वाबों  को.
मिली  है दिल के अरमानों  को एक न उड़ान है,
मिलकर बनाया है हमने एक नया जहान है. 
सपनों से बनाया,
रंगों से सजाया,
अपने  अरमानों को,
हँसते रहें, मुस्कुराते रहें,
खुशियों के गीत गाते रहें.
मिली  है दिल के अरमानों  को एक न उड़ान है,
मिलकर बनाया है हमने एक नया जहान है. 

Comments

Popular posts from this blog

“तत्व,व्यवहार,प्रमाण और सत्व” की चतुर्भुज को जो साधता है वो है...क्रिएटर” – मंजुल भारद्वाज (रंग चिन्तक )

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में- भाग - 5.. आज का नाटक है “मैं औरत हूँ!”