Friday, October 16, 2020

अमूर्त के मूर्त होने का कला बोध ही सौन्दर्य है! – मंजुल भारद्वाज

 अमूर्त के मूर्त होने का कला बोध ही सौन्दर्य है! – मंजुल भारद्वाज


कला का अहसास ही सौन्दर्य है! दृष्टि,विचार,चेतना का अमूर्त जब मूर्त होता है तब कला जन्मती है. कला का जन्म ही सौन्दर्य है. कला के जन्मने का शास्त्र ही उसका सौन्दर्य शास्त्र है. कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. मनुष्य की आत्महीनता,विकार और विध्वंसक वृति को कला आत्मबल,विचार और विवेक में परिवर्तित करती है.थिएटर ऑफ़ रेलेवंस कला के मूल उद्देश्य के क्रियान्वन के लिए प्रतिबद्ध है. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के नाटकों का सौन्दर्य उसके मूल उद्देश्य से उत्प्रेरित होता है. रंगमंच की प्रस्थापित रूढ़ियों को तोड़ता है. दर्शक की चेतना को अमूर्त से जोड़ता है. कल्पना शक्ति से नाटक के अमूर्त को मूर्त करते हुए कलाकारों की देह और अभिनय प्रतिभा को तरंगित कर स्थूल सभाग्रह को स्पंदित करता है. इस प्रकिया में देह के दृश्य बंध,मंच की भूमिति, नाटक के दृष्टिकोण के अनुसार रंगमंच के कोण का उपयोग अद्भूत होते हैं. कलाकारों की आवाज़,मंच आवागमन,मंच कार्य सिद्धि,आपसी समन्वय, रंगमंच के स्पर्श से स्पंदित होते हैं यह स्पंदन नाटक के मूल पाठ और मंचन के ध्येय
से उत्प्रेरित होता है. नाटक जड़ नहीं,स्थूल नहीं, जीवन का ‘एक जीवित घटनाक्रम है’ इस घटनाक्रम की आत्मा होती है कल्पना.दर्शक जानता है वो नाटक यानी झूठ देख रहा है. सम्प्रेष्ण की कल्पना सिद्धि से थिएटर ऑफ़ रेलेवंस असत्य से अ का मुखौटा हटा दर्शकों को सत्य से रूबरू करता है.

Friday, October 9, 2020

रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज का नाटक राजगति ‘राजनीति गंदी है’ के कलंक को धोता है !



 नाटक राजगति ‘राजनीति गंदी है’ के कलंक को धोता है और देशवासियों को राजनीति में विवेक सम्मत सहभगिता के लिए प्रेरित करता है!

रंगचिंतक मंजुल भारद्वाज का नाटक राजगति भारत और विश्व की अलग अलग राजनैतिक विचारधाराओं के अंतर्विरोधों को विश्लेषित कर मानव कल्याण के लिए उनके समन्वय की अनिवार्यता को रेखांकित करता है. नाटक भूमंडलीकरण के विनाश और विकास के पाखंड पर प्रहार करता है. कैसे भूमंडलीकरण ने मनुष्य को खरीदने और बेचने की वस्तु में बदलकर विश्व की लोकतान्त्रिक व्यवस्थाओं को पूंजीवाद की कठपुतली बना, विकारी लोगों को सत्ता में बैठा दिया है. यह विकारी लोग पूरी पृथ्वी और मनुष्यता को लील रहे हैं.
नाटक राजगति केवल सत्ता परिवर्तन के लिए होने वाले आंदोलनों की निरर्थकता को उजागर करता है. हाल ही में भारत में हुए एक भ्रष्टाचार विरोधी आन्दोलन से सत्ता तो बदल गई. पर महाभ्रष्ट और विकारी उस पर विराजमान हो गए जो अर्थव्यवस्था के साथ साथ लोकतान्त्रिक संस्थाओं का ध्वंस कर संविधान के अवसान में दिन रात लगे हुए हैं.
नाटक राजगति जनता को अपनी राजनैतिक मुक्ति के लिए चार सूत्र देता है सत्ता,व्यवस्था,राजनैतिक चरित्र और राजनीति. सत्ता में हमेशा कालिख रहेगी चाहे वो किसी की भी हो और कोई भी हो, व्यवस्था अपनी जड़ता से किसी भी परिवर्तन को प्रभावहीन बना देती है, राजनैतिक चरित्र गढ़े बिना पूरी राजनैतिक प्रक्रिया पाखंड का शिकार होती है. इसलिए सत्ता,व्यवस्था,राजनैतिक चरित्र और राजनीति के चारों आयामों को एक साथ समझना अनिवार्य है. नाटक राजगति ‘राजनीति’ को पवित्र नीति मानता है. जनता से राजनीति में विवेकपूर्ण सहभागिता की अपील करता है. राजनीति सत्ता,व्यवस्था और राजनैतिक चरित्र की गंदगी को साफ़ करने की नीति है.
हर भारतवासी में राजनीति की पवित्र मशाल को जलाकर स्वतंत्रता सेनानियों ने देश को गुलामी से मुक्त कराया. पर चंद सत्ता लोलुपों,सत्ता के दलालों ने ‘राजनीति गंदी है’ के कलंक को सुनियोजित षड्यंत्र से 132 करोड़ देशवासियों के माथे पर चिपका दिया है. जिसकी वजह से जनता राजनैतिक प्रक्रिया में सहभागी नहीं होती. कोई सहभागी हो रहा है तो सिर्फ़ सत्ता लोलुप जो धनपशुओं के बल पर वोट खरीद कर हर चुनाव में लोकतंत्र को कलंकित करता है.
एक ऐसे विध्वंसक काल में जब विकारी सत्ताधीश जनता को उसी के मल,मवाद,विकार और पाखंड में धंसा कर, राष्ट्रवाद के नाम पर वोट लेकर, समाज को उन्मादी भीड़ बना, जनता को कूट रहा हो, तब नाटक राजगति देशवासियों को देश का मालिक होने का अहसास दिला संविधान सम्मत,विविधता के विधाता भारत के निर्माण की पैरवी करता है. राजगति नाटक ‘राजनीति गंदी है’ के कलंक को धोता है और देशवासियों को राजनीति में विवेक सम्मत सहभगिता के लिए प्रेरित करता है .

Tuesday, October 6, 2020

मैं कौन हूँ! – मंजुल भारद्वाज

 


मैं कौन हूँ! – मंजुल भारद्वाज

एक सवाल अंतर्मन में गूंज रहा है... मैं कौन हूँ! यह सवाल इसलिए भी कौंध रहा है क्योंकि जिस समाज में आज जीवित हूँ वो फ्रोजन स्टेट में है. तर्क से परे आस्था के अंधकार में सोया हुआ. अपनी पहचान,आवाज़,अस्तित्व और अधिकारों को बेचकर विकास खरीदता हुआ यह समाज विनाश में चारों ओर से धस गया है. सरेआम बोले हुए झूठ को सच मानता है. बार बार बोले हुए झूठ पर सवाल नहीं करता.बस भेड़ बन जयकारा लगाता है. आदमी के भेष में अपने जिस्म को ढ़ोती हुई भेड़ों को मैंने पहले कभी नहीं देखा. बहुत पार्टियों की सरकार आई और गई. पर जुमले और झूठ पर टंगी सरकार पहली बार देखी है. देश की जनता को भेड़ बनते पहली बार देखा है. संविधान के ‘WE THE PEOPLE’ को असहाय और बिलखते हुए पहली बार देखा है. देश के एक सूबे को विकास के नाम पर खत्म कर देने के षड्यंत्र को पहली बार देखा है. गांधी को फूल माला चढाते हुए सत्ताधीश को ‘मैं भी गोडसे’ बोलते हुए भी पहली बार देखा है. देश के निर्माताओं को राष्टद्रोही करार देने वाले तानाशाह और उनको सोशल मीडिया पर प्रचारित करते समाज को पहली बार देखा है ... देश के संविधान को नमन कर उसको खत्म करने वाले सत्ताधीश को पहली बार देखा है...
पूरा समाज फ्रोजन स्टेट में है ...और अपनी चेतना में मैं दिन रात अकेला जल रहा हूँ ... उस जलती हुई रौशनी में यहाँ तक के सफ़र का अवलोकन करता हूँ ... 2 अक्तूबर को गाँधी से बात हुई ...उनसे पूछा बापू क्या मिला आपको? वो मुस्कुराये जो तुम्हें मिला ‘अकेलापन और चंद सवालों के समाधान के लिए अपनी चेतना की आग में जलते रहने का इनाम! ... 28 सितम्बर को भगत सिंह मिले उनसे पूछा क्यों फांसी पर चढ़े? ...उन्होंने कहा रौशनी के लिए खुद जलना पड़ता है ... 14 अप्रैल को अम्बेडकर से बात हुई उनसे पूछा क्यों संविधान बनाया? उन्होंने कहा ‘सत्ता की चेतना’ जगाने के लिए ... तीनो का जवाब जलती हुई मशाल में घी डाल गया... आग़ और भड़क गई.. ये तो चले गए .. इनको जो करना था वो कर गये ...सवाल फिर सामने खड़ा हो गया ..मैं कौन हूँ?
अपनी ही आग़ में जलते हुए यूँहीं बैठा था की मार्क्स से मुलाक़ात हो गई. उनसे पूछा क्यों तानशाहों की ढाल बने हुए हो सर्वहारा के नाम पर? वो कुछ बोलते इससे पहले ही उनके परम भक्त,उनके बारे में सारी किताबें पढ़ने का दावा करने वाले मुझ पर टूट पड़े... उन्होंने ऐलान किया तुम मार्क्स से सवाल नहीं कर सकते .. एक लम्बी किताबों की सूची देते हुए कहा जाओ इनको पढ़कर आओ फ़िर सवाल पूछना मार्क्स से ... चौपाल में मौजूद लोगों को मैंने निहारते हुए देखा..उन्होंने हाथ झटकते हुए कहा हमने मार्क्स को नहीं पढ़ा ..हम कुछ नहीं बोल सकते !
दुनिया और देश की मिटटी में खाक छानते हुए 50साल के जीवन और 28 वर्ष रंगकर्म, रंग मतलब विचार, विचारों का कर्म करते हुए एक एक मौसम को देखा और बदला है.पर भूमंडलीकरण के विध्वंस ने उस सारे बदलाव को ‘अर्थहीन’ कर दिया. क्या गांधी को सत्ता के बटवारे ने अर्थहीन कर दिया था? सवाल सुलझने की बजाए और उलझ गया ..मैं कौन हूँ? क्या खोज रहा हूँ?
अपने रंग सिद्धांत ‘थिएटर ऑफ़ रेलेवंस’ पर लिखे नाटकों को लेकर जब 1992 के साम्प्रदायिक दंगों में जलती मानवीयता को बचाने निकला था अपने रंगकर्मियों के साथ तो भ्रमित दंगाइयों में कहीं दबी हुई इंसानियत थी ..इसलिए नाटक ने जब हाथों में तलवार लिए भीड़ को इंसानी आवाज़ दी तो उन्होंने तलवार फेंकते हुए कहा था ..इंसानियत जिंदाबाद! आज भीड़ पशु के नाम पर दिन दहाड़े सत्ताधीश के इशारे पर सुनियोजित ढंग से क़त्ल करती है.. बचाने वाले पुलिसवाले की कुल्हाड़ी और उसके ही सर्विस रिवाल्वर से सरेआम हत्या कर देती है और सत्ता हत्यारों को फूल माला पहनाती है .. और समाज मौन धारण कर लेता है... मौन से सवालों की आग़ और धधकती है ...
क्या खोज रहा हूँ मैं? मैं कौन हूँ! अपने ही घर में ..अपने ही टीवी में अपने ही पैसों से ...अपने ही को हर पल ..हर रोज़ हिन्दू मुसलमान में तक्सीम होते देख रहा हूँ .. अपने घर में निकम्मी महानगर पालिका की वजह से बारिश के पानी में डूबा हुआ बैठा हूँ मैं .. अपने ही पखाने को अपने घर में तैरता, सड़ता हुआ देख ... मैं सत्ताधीश का शौचालय पर भाषण सुन रहा हूँ ... सरदार पटेल के स्टेचू के नीचे देश को दरकते हुए देख रहा हूँ मैं ... सरदार सरोवर के पानी में डूबते भारतवासियों को देख रहा हूँ मैं...
मैं विकास खरीदते जिस्मों में चेतना जगाना चाहता हूँ ...राष्ट्रवाद की उन्मादी भीड़ में ‘इंसानियत’ जगाना चाहता हूँ ...अपनी विवशता को अपनी ताक़त बनाना चाहता हूँ ... एक गोली ..या फांसी के फंदे या राष्ट्रद्रोह के मुकदमें का स्वागत करते हुए अपने आसपास भारत खोजना चाहता हूँ मैं ..अपनी रंग चेतना से मूर्छित समाज में भारतीयता का भाव जगाना चाहता हूँ ..नेताओं की चाटुकारिता की बजाए जनता में देश का मालिक होने का अहसास पैदा करना चाहता हूँ .. नौकरशाहों को नेताओं का रक्षक होने की बजाए संविधान का रक्षक होने का फर्ज़ जगाना चाहता हूँ ..लहूलुहान न्यायपालिका में न्याय और सत्ताधीश में विवेक जगाना चाहता हूँ ....मैं भारतवासी हूँ ...भारत मैं संविधान सम्मत भारत का पुन:निर्माण करना चाहता हूँ ...मैं... मैं को हम में साकार करना चाहता हूँ !

Thursday, October 1, 2020

थिएटर ऑफ़ रेलेवंस :2 अक्तूबर गांधी जयंती पर : रंगकर्म,राजनीति और गांधी पर प्रखर राजनैतिक विश्लेषक धनंजय कुमार का लेख

 2 अक्तूबर गांधी जयंती पर : रंगकर्म,राजनीति और गांधी पर प्रखर राजनैतिक विश्लेषक धनंजय कुमार का लेख





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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस.....

नेता ऐसे बनते हैं ! 

नेता आसमान से नहीं गिरते, न ही किसी फैक्ट्री में पैदा होते हैं. नेता ज़मीन में उगते हैं. संस्कारों, संवेदनाओं, वर्जनाओं और मर्यादाओं के बीच पलते हैं. शोषण-अन्याय को देखकर उद्वेलित होते हैं. खुद को मानवीय-सामजिक प्रयोगशाला में तपाते हैं, तब जाकर औरों के लिए यथासंभव सुगम राह ढूंढ पाते हैं. जबतक कमज़ोर व्यक्ति का दुःख आपको दुखी नहीं करता, बेचैन नहीं करता आप नेता नहीं हैं. 

गांधी की ही नेता होने की यात्रा देखिये, तो बहुत कुछ स्पष्ट होता है. गांधी बालपन में आम बच्चों जैसे ही थे, झूठ भी बोलते थे और जहाँ असहज महसूस करते थे, वहां से बचने की राह ढूंढते थे. इसी क्रम में मुम्बई कोर्ट में महीनों आने जाने के बाद भी केस लड़ने की हिम्मत नहीं जुटा सके. संभव हो सच बोलने का संकल्प उनकी राह आड़े आ रहा हो. क्योंकि वकालत सिर्फ सचबयानी तो है नहीं.

फिर जब दक्षिण अफ्रीका जाने की बात आई तो गांधी वकालत करने की असहजता की वजह से ही दक्षिण अफ्रीका जाना स्वीकार किया था. जाते वक़्त माँ से मिली सीख को गांधी पोटली में बाँध कर ले गए और पूरी कोशिश की उसका पालन हो-चाहे नॉनवेज न खाने की बात हो या अपने पारिवारिक संस्कार के पालन की बात. गांधी अपने आप को बदलने के बजाय परम्परागत राह ढूंढते रहे. अपने गुजराती समाज से जुड़े. लेकिन जब देखा कि वहां बहुत कुछ नियम के विरुद्ध है, अन्यायकारी है तो प्रतिकार किया. जब देखा कि आदमी आदमी में भेद है और भारतीयों के साथ अंग्रेज बड़ा अमानवीय व्यवहार करते हैं, तो उन्हें बुरा लगा. उनका हृदय पीड़ा से भर गया. और प्रतिकार के साथ साथ सेवा की राह को उन्होंने अपनाया. सेवा और प्रतिकार के साथ वह सत्य, निष्ठा और अहिंसा के दम पर डटे रहे. अंग्रेजों ने अपमान भी किया, उनके साथ मार पीट भी की, लेकिन गांधी ने सत्य, अहिंसा, प्रतिकार और सेवा का मार्ग नहीं छोड़ा. और इसी निष्ठा ने गांधी को गांधी बनाया.

गांधी को मजबूती देने का काम नरसी मेहता के भजन ने किया-वैष्णव जन तो तैंने कहिये जो पीर पराई जाणे रे. गांधी को मजबूती देने का काम बचपन में देखा गया नाटक सत्य हरिश्चंद्र ने किया. गांधी को मज़बूत करने का काम उनकी बैरिस्टरी  की पढ़ाई ने किया. गांधी को मज़बूत करने का काम उनकी संवेदनशीलता ने किया.

गांधी की एक और विशेषता उन्हें आगे बढ़ाती है वह थी लक्ष्य तक पहुँचने की ज़िद. और ऐसा करते वक़्त वह अधीर नहीं होते थे, बल्कि वह सतत मनुष्य बने रहते थे. नतीजा होता था, अन्याय करनेवाला स्वयं बेचैन हो उठता था. वह अन्याय करने वालों पर पर गुस्सा करने के बजाय उसे आइना दिखा दिया करते थे. और यही दमन करने वालों को , गलत करने वालों को झंझोर दिया करता था. और गांधी अंततः सफल होते थे.

गांधी की अगर ह्त्या नहीं होती, तो बेशक भारत पाकिस्तान पुनः एक हो जाता है. अंग्रेजों की बंटवारे की नीति कामयाब नहीं होने पाती.  और दुनिया के सामने गांधी अपूर्व उदाहरण पेश करने में कामयाब हो जाते.

गांधी नेता इसलिए थे कि वह अपने गुण अवगुण जानते थे और न सिर्फ जानते थे, अवगुणों पर विजय पाने के लिए सतत प्रयोग रत रहते थे. वह जानते थे मनुष्य में अनेक खामियां हैं, और उन खामियों को जीतकर वह दुनिया के सामने उदाहरण रखना चाहते थे कि मनुष्य अपनी कमजोरियों पर विजय पा सकता है. हिंसा, नफ़रत, आपाधापी सबसे बचा जा सकता है. और दुनिया को सुन्दर बनाया सकता है. लेकिन उनकी हत्या ने उनके काम को पूरा नहीं होने दिया.

गांधी मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला जानते थे. मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला आती कहाँ से है? रंगचिन्तक  Manjul Bhardwaj कहते हैं मनुष्य को मनुष्य बनाने की कला कला में निहित है. आप गांधी के बचपन को देखिये-गांधी के बालमन पर नाटक सत्य हरिश्चंद्र का बड़ा गहरा असर पडा और उन्होंने व्रत लिया सच बोलने का. और एक सत्य बोलने की आदत ने उन्हें जीवन को समझने की चाभी दे दी.

मंजुल भारद्वाज मानते हैं कोई हर व्यक्ति में नेता होने के गुण हैं, लेकिन ज़रुरत होती है उसे संवारने और निखारने की. स्पष्ट दृष्टि, स्पष्ट लक्ष्य और लक्ष्य तक पहुँचने की सात्विक  ज़िद ही व्यक्ति को नेता बनाती है. गांधी की ज़िद लक्ष्य को सिर्फ़ हासिल करने की ज़िद नहीं थी, बल्कि वह सात्विक मार्ग से लक्ष्य को हासिल करना चाहते थे. ये सात्विक ज़िद ही गांधी को नेता बनाती है. अन्यथा लक्ष्य तक तो राजा भी पहुँच जाता है, कोई बदमाश व्यक्ति भी लक्ष्य को पा लेता है. दूसरी महत्वपूर्ण बात गांधी का लक्ष्य प्राप्त करना कोई चमत्कार नहीं है, बल्कि यह एक वैज्ञानिक प्रयोग है. आप उनके बताये रास्ते पर चलिए लक्ष्य चाहे कितना ही दुर्लभ क्यों न हो प्राप्त होगा ही.

मंजुल कहते हैं, यह बिना सांस्कृतिक चेतना के जागृत हुए हो ही नहीं सकता. गांधी हमारी सांस्कृतिक चेतना के नायक हैं और मैं उन्हें पहला गुरू मानता हूँ. दुनिया में कई तरह की क्रांतियाँ हुई, लेकिन कोई भी क्रान्ति मनुष्य को मनुष्य नहीं बना सकी. सारी क्रांतियाँ सत्ता पर आकर समाप्त हो गयीं और सत्ता फिर उसी व्यवस्था में बदल गयी, जिस व्यवस्था के विरोध में क्रान्ति की गयी. साम्यवादी क्रान्ति का भी वही हाल क्यों हुआ? आज देखिये कि दोनों बड़े साम्यवादी देश अमेरिका से भी बड़े साम्राज्यवादी बने हैं. तो सवाल उठता है, क्रांतियाँ कहाँ और क्यों भटक जाती हैं?

क्रांतियाँ इसलिए राह भटक जाती है क्योंकि उसमें सत्य और निष्ठा नहीं है. उसमें दूसरे को व्यवहार से जीत लेने या कहें अपना बना लेने की कूबत नहीं है. कमज़ोर व्यक्ति की पीड़ा को महसूस करने वाला हृदय नहीं है. सत्ता बन्दूक की गोली से निकल सकती है, लेकिन मनुष्य कला से ही निकलेगा, सांस्कृतिक चेतना ही मनुष्य को मनुष्य बना सकती है. हमने जिस नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात किया है, वो थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस सांस्कृतिक चेतना का द्वार खोलता है. मेरे लिए थियेटर सिर्फ मनोरंजन के लिए कला का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि थियेटर कला के माध्यम से मनुष्य के भीतर सांस्कृतिक दीप जलाने का माध्यम है. इसीलिये मैंने इसे थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस कहा. जो कलाकार को विषय से न सिर्फ जोड़ता है, बल्कि उसके भीतर परिवर्तन की गंगा बहाता है.

मंजुल कहते हैं कला तबतक अधूरी है जबतक वह मनुष्य की ज़िंदगी को न बदले और मनुष्य की ज़िंदगियों को बदलने में राजनीति की अहम भूमिका है, इसलिए मेरा मानना है कि कला और राजनीति का गहरा संबंध है. गांधी राजनीतिज्ञ नहीं थे वह एक संवेदनशील व्यक्ति थे, दूसरों की पीड़ा उन्हें परेशान करती थी, और वह उससे मुक्ति की राह निकालने चल पड़ते थे. जब मुक्ति की राह पर निकलते थे तो सत्ता और शोषणकारी शक्तियों से उनका टकराव होता था. गांधी भले मंच पर अभिनय नहीं करते थे, लेकिन जीवन रूपी मंच के वो बड़े अभिनेता थे. जिन्हें देखकर अंग्रेजों का हृदय भी पिघल जाते थे.

तो दुनिया को गांधी जैसे एक नहीं अनेक नेताओं की ज़रुरत है. नेता जो पूरी मानव जाति को मनुष्यता की राह ले चले. और यह सांस्कृतिक क्रान्ति से ही संभव है. जिसकी मशाल लिए थियेटर ऑफ़ रेलेवेंस चल रहा है. हमारे साथी चल रहे हैं. गांधी का सपना सोती आँखों का सपना नहीं था, जागती आँखों का सपना था और यह सच होकर रहेगा. गांधी का मार्ग ही दुनिया की सही राह है.

धनंजय कुमार, मुम्बई

#रंगकर्म#राजनीति #गांधी #थिएटरऑफ़रेलेवंस

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सृजनशील लेखक,प्रयोगशील फिल्म एवम् धारावाहिक निर्माण के पक्षधर, स्टार वर्चस्व वाले भारतीय सिनेमा में लेखकों के मौलिक अधिकारों की बुलंद आवाज़, कोरोना लॉकडाउन में देश की राजनीति को मथने वाले प्रखर राजनैतिक विश्लेषक Dhananjay Kumar ने  विगत 28 वर्षों से थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत उत्प्रेरित सांस्कृतिक चेतना आन्दोलनको नेतृत्व निर्माण और संवर्धन के अनोखे प्रारूप में आपके सामने रखा है. गांधी को सत्य की डगर पर चलने का पाठ पढ़ाने वाले रंगकर्म की निष्ठा को बड़ी बारीकी और कलात्मक स्वरूप को बिन्दुवार शब्दांकित किया है!

Sunday, September 27, 2020

मूलतः रंगमंच एक राजनैतिक कर्म है जो राजनीति और रंगमंच के अन्तर्सम्बन्ध को नहीं जानता वो ‘रंगकर्मी’ नहीं है! –मंजुल भारद्वाज

 रंगमंच और राजनीति :


मूलतः रंगमंच एक राजनैतिक कर्म है जो राजनीति और रंगमंच के अन्तर्सम्बन्ध को नहीं जानता वो ‘रंगकर्मी’ नहीं है! –मंजुल भारद्वाज

आज का समय ऐसा हैआज का दौर ऐसा है आज विपदा का दौर हैसंकट का दौर हैमहामारी का दौर हैया भारत के संदर्भ में कहूं तो एक ऐसा दौर है जब राजसत्ता अपने देशवासियों को खत्म करने पर उतारू है । ऐसे समय में बहुत अपेक्षाएं होती हैं । जाहिर है होनी भी हैंमानव स्वभाव हैअपेक्षाएं आप अपने - अपने तरीके से करते हैं । अपने लिए करते हैं और कई बार समग्र करते हैं और जो समग्र चिंतन होता है वही कलात्मक हैनहीं तो एक निजी सुख या निजी स्वार्थ होता है ।

आज तकनीक की संचार क्रांति पर सवार होकर मैं आप तक पहुंच रहा हूँ। यह पहुंचना संचार है। यह संचार व्यापक है। मतलब मैं अपने घर के कोने में बैठ के आज पूरी दुनिया में हूँदुनिया में आप मुझे पढ़ रहे हैंसमझ रहे हैंपर क्या आप मुझे महसूस कर रहे हैंमैं बात कर रहा हूँ कि तकनीक के द्वारा हम संचारित हैंतकनीक संख्यात्मक पूरा वैश्विक रूप ले चुकी हैलेकिन जो रूबरू होने का अनुभवअनुभूतिस्पर्श रंगमंच पर है वह यहां नहीं है और मैं जानता हूँ कि आप मेरे इस बात से सहमत हैं।

जब मैंने कहां सहमत हैं तो आज के इस लेख-चर्चा में बहुत सारे बिंदु असहमति के होंगे और वह असहमति के बिंदु कोई विरोधाभास नहीं है। बल्कि जो रंगमंच का लक्ष्य है उसे पाने का अलग अलग तरीका हैअलग-अलग पद्धति हैं और इस पद्धति के तहत हम आज सहमति असहमति से आगे बढ़ेंगे और मथेंगे इस समय को और इस को मथते हुए हम अपनी अवधारणाओं को मथेंगे। आप सब जो मुझे पढ़  रहे हैं आप सबकी अपनी अपनी अवधारणाएं हैं। वह अवधारणाएं आपने अपना जीवन जीते हुए बनाई हैंजीवन जीते हुए अनुभव की हैंउन अवधारणाओं को आज थोड़ा कुरेदेंगे ।

आज का दौर ऐसा है  खासकर भूमंडलीकरण के इस दौर से पहले यानी 1990 के पहले हम देश के नागरिक थे, 1990 के बाद हम देश में ग्राहक हो गए हैं तो हमको ऐसा कंडीशंड किया जाता है कि जो लिख रहा है उसकी यह जिम्मेदारी है कि पढ़ने वाले को संतुष्ट करे। भूमंडलीकरण के इस खरीद-फरोख्त  वाले दौर में जाहिर है जो बेच रहा होगा उसको ग्राहक यानी पाठक को संतुष्ट करना पड़ेगानहीं तो उसका सामान आप खरीदेंगे नहीं। लेकिन आज का विमर्श खरीद-फरोख्त नहीं है। मैं आपको कुछ बेच नहीं रहा हूँ और आप कुछ खरीद नहीं रहे हो। तो समझ बनाने के लिए हम सब की बराबरी की जिम्मेदारी है और उस जिम्मेदारी में आज आइए अपनी अवधारणाओं में हम ढूंढते हैं अपना-अपना बुद्ध!

'बुद्धका मतलब यहां एक बिंब हैएक तत्व हैजिसको मैं आज आपके सामने रख रहा हूँ। वह तत्व है अहिंसा कावह तत्व है प्रेम कासद्भाव कासह अस्तित्व का। बुद्ध के पहले से है कलारंगमंचऔर रंगमंच तब से है जब मनुष्य ने मनुष्य होने का एहसास किया था। या मैं कहूं मनुष्य से इंसान बनने की शुरुआत कला से शुरू हुई. मनुष्य ने जब समूह को समझा तो कला सामूहिक बनी और रंगमंच के रूप में हमारे सामने आज मौजूद है। मैं यह भी कह दूं कीरंगमंच को शुरू होने से लेकर आज तक कोई खतरा नहीं है और ना आगे होगा। वह खतरा इसलिए नहीं है ‘जब तक मैं इंसान के रूप मेंमनुष्य के रूप मेंसांस लेता रहूंगाजब तक मुझे जीने की चाहत रहेगीजब तक मुझे स्पर्श की अनुभूति रहेगीतब तक रंगमंच जीवित है’।हां रंगकर्मियों कीरंगमंच पर काम करने वालों की चुनौतियां हो सकती हैं और रहेंगी।

आइए समय को समझते हैं। समय का मतलब है स से सत्यम से मंचित और य से यायावर। यानी सत्य को मंचित करता हुआ यायावरजो सत्य को मंचित करता है वही रंगकर्मी है और आज के इस समय में एक क्रूरनिर्दयीनिर्मम दौर में हम जी रहे हैं। महामारी ने हमको पुनरावलोकन के लिए चेताया है। महामारी हमें यह कह रही है कि आप मनुष्यों की लालसा,लालच प्रकृति में दखल है.आप पुनरावलोकन कीजिए और अपने आप यह तय कीजिए कि आप को कैसे जीना है?

लेकिन राजसत्ता या राज्यव्यवस्था अलग व्यूहरचना रच रही है। मैं यहां तकनीक का बिंदु लाना चाहता हूँ। 70 महीने से हम तकनीक की बात सुन रहे हैंसमझ रहे हैंडिजिटल इंडिया की बात कर रहे हैं। डिजिटल हो गया है सब और यह भी सच है कि डिजिटल जुमलों से 70 साल के बाद 70 महीनों से एक अनोखी बहुमत की सरकार है। आप सोच रहे होंगे कि रंगमंच का राजनीति से क्या सम्बन्ध? तो मैं यह स्पष्ट कर दूं आपको कि मौलिक रूप से मूलतः रंगमंच एक राजनैतिक कर्म है! वह कैसे इसका विस्तार मैं आगे कर रहा हूँ. डिजिटल इंडिया को समझिए। डिजिटल इंडिया को समझते हुए हमें 1990 के बाद से यह समझना है कि 1990 के बाद इस देश में कौन रह रहा है। इस देश में वो रह रहा है जो मंडलकमंडल और भूमंडल से निकला है और आप देखिए कि मंडल वाले आरक्षण में शामिल होकर नौकरियों में हैं  यानी कि वह साधन हीनता से संसाधन संपन्न हो गए हैं। जो भूमंडल वाले हैं वह देश के संसाधनों को बेच कर अमीर हो रहे हैं और कमंडल वाले सत्ता पर बैठे हैं। डिजिटल जुमलों से वह सत्ता पर काबिज हैं। अब जब यह विपदा आई और पहला लॉक डाउन हुआ फिर दूसरा लॉक डाउन हुआ और फिर तीसरा हुआ और विगत 15 से 20 दिनों में जो मंडलकमंडल और भूमंडल के बाहर जो देशवासी हैंजो 70 महीनों में किसी को नहीं दिख रहे थे वो हम सबको दिखाई देना शुरू हो गए और हम सबको इस तरह से दिखाई देना शुरू हुए कि उन्होंने इस डिजिटल सत्ता को उखाड़ फेंका है। आप सही पढ़े हैं उखाड़ फेंका है!

जब आपके मन में कोई सृजन भाव आता है या कोई कलात्मक विचार आता है तो आप दिन रात उसको मथते रहते हैं फिर उसे लिखते हैं फिर उसे प्रस्तुत करते हैं उसके बाद वह दर्शकों को दिखाई देता है। आज यह अदृश्य भारतीय अपने कदमों से पूरे भारत को माप रहे हैं। चल रहे हैं इनका चलना लोकतंत्र का संघर्ष है। क्योंकि 70 महीने वाली सरकार ने डिजिटल फरेब से सबको काबू कर लिया था यानी मध्यमवर्गनिचला मध्यमवर्गसरकारी तंत्रमीडिया सब उनके जयकारे में लगे हैं। दुर्भाग्य है सेना भी फूल बरसा रही है । लेकिन यह अंतिम व्यक्ति वही है जो गांधी के हैंजो अंबेडकर के हैंजो मार्क्स के सर्वहारा हैंइन अंतिम व्यक्तियों ने एक सत्याग्रह किया है या मैं कहूं सत्ता से विद्रोह किया है। प्रतिरोध किया है और वह प्रतिरोध अहिंसक है।

बहुत व्यथित हुआ मैं और लगातार देखता रहा फिर जिस दिन औरंगाबाद (महाराष्ट्र) की घटना घटी और ट्रेन का जो हादसा हुआ उस दिन बहुत वेदना के बाद एक रचना रची और एक नई दृष्टि मुझे मिली। यही लोग हैं जो लोकतंत्र के लिए लड़ रहे हैं और यह डिजिटल इंडिया के राज में कहीं नहीं हैं। इनकी संख्या 12 करोड़ बताई गई है। मैं बात कर रहा हूँ समय की12 करोड़ का मतलब है कि वे लगभग जर्मनी के डेढ़ गुना के बराबर हैं। यानी दुनिया की पांचवीं आर्थिक महासत्ता हमारे देश में सड़कों पर चल रही है और जब मैंने वह कविता लिखी उस पर सवाल भी उठे। उस पर पूछा गया "बताओ मैं क्यों नहीं चला" ! यह भी चर्चा हुई कि यह कोई सोचा समझा फैसला नहीं है।

आज मैं जो भी बात कर रहा हूँ वह केवल और केवल रंगमंच के बारे में बात कर रहा हूँ। जी सही समझे आप और जब पढ़ा लिखा मध्यमवर्ग अपने घर में बैठकर कोरोना से हाथ स्वच्छ करने का प्रण ले रहा थाया बाहर मत निकलो की सीख दे रहा था उस समय यह मजदूरयह गरीब सोच रहा था। इसका सत्याग्रह बिना सोचा समझा नहीं है। इसका सत्याग्रह निरा पेट से निकला भी नहीं है। इसका सत्याग्रह है "मुझे करने के लिए काम चाहिए"। और जब मुझे करने के लिए कोई काम नहीं है तो मैं वहां पहुंचना चाहता हूँ जहां मुझे थोड़ा बहुत काम मिलेजहां मुझे सुरक्षा मिलेजहां मेरा अपना होना हो !

इस सत्याग्रह नेइस डांडी मार्च नेइस अहिंसक प्रतिरोध नेभारत के लोकतंत्र को जीवित कर दिया है। और डिजिटल सरकार को खत्म कर दिया है। जी कानूनी रूप से वे सत्ता में हैंलेकिन वे खत्म हो चुके हैं । गिरते हुए थोड़े दिनों में आप देखेंगे उन्हें।

मैं यह रेखांकित करना चाहता हूँ कि रंगमंच इसी तरह से इनविजिबल होता है और जो विजिबल होता है वह उसका 10% हिस्सा भी नहीं होता। रंगमंच को आपको समझना है तो एक बिंब आपके सामने रखता हूँ - वह है "आइसबर्ग" यानी "हिमखंड"। जितना समुद्र के ऊपर यानी पानी की सतह के ऊपर हमें हिमखंड दिखता है वह उसके टोटल आकार का 10% होता है बाकी सतह के नीचे होता है। तो 90% रंगमंच में क्या होता है रंगमंच यह शब्द जब आपके मस्तिष्क में कौंधता है तो आपके सामने क्या क्या दृश्य आते हैंआपके सामने आता है एक ऑडिटोरियमआपके सामने आता है स्टेजआपके सामने आते हैं दर्शकआपके सामने आते हैं सेट,कॉस्टयूममेकअपएक्टरपर यह अपने आप में थिएटर नहीं हैं। इस सबके पीछे क्या होता हैइस सबके पीछे है जीवन। जीवन बहुत बड़ा है और जीवन ही सत्य है। जीवन की पुनरावृत्ति है रंगमंच और जब तक आपको जीवन का अभ्यास नहीं होगा तब तक आप रंगकर्म में मौजूद हो सकते हैंसंवाद बोल सकते हैंपर रंगकर्म को आप कितना जीते हैं यह एक सवाल है?

आज जब मजदूरों ने अपनी आहुति देकरअपने प्राणों की आहुति देकरइस लोकतंत्र को जिंदा किया हैइसी तरह से रंगमंच मनुष्य में मनुष्य को जीवित करता है। मनुष्य में मनुष्य को जीवित करना या मनुष्य को इंसान बनाना यही रंगमंच का अंतिम ध्येय है यह समझ लीजिए। और अगर यह ध्येय पूरा नहीं होता है तो हम रंगमंच नहींरंगमंच के नाम पर कुछ और कर रहे हैं।

डिजिटल यानी तकनीकडिजिटल थिएटर एक नया जुमला उभर आया है। यह डिजिटल के फरेब को फिर से आपके सामने उदाहरण देता हूँ कि एक जनधन योजना का बहुत सारा ढोल पीटा गया। भूखे लोगों को उनके जनधन अकाउंट में 500 – 500 रूपये  ट्रांसफ़र किए और जब वो अपने अकाउंट से पैसा निकालने गए तो इस डिजिटल सत्ता की पुलिस ने उनका डंडों से स्वागत किया। सारी की सारी महिलाओं को हिरासत में लिया गया और उनको 10 हजार के मुचलके पर छोड़ा गया। यह है डिजिटल इंडिया!

दूसरा एक अनुभव है जिसको समझिए। आप सोचिए यह पैसा मनीआर्डर से उनके घर पहुंचा तोएक डाकिया उनको देकर आतातो क्या उनको डंडे खाने पड़तेहां मैं समझ गया आप बहुत समझदार हैंपढ़े-लिखे हैंसभ्य हैंदिमाग में यह सवाल आ रहा है सब जगह जब लॉक डाउन हैबंद है तो कैसे पहुंचता डाकियाजब पुलिस का डंडा आप तक पहुंच सकता हैतो डाकिया क्यों नहीं पहुंच सकता! अब तो आप देखिए कि डिजिटल इंडिया के फरेब से सरकार भी बाहर निकली है। दारु के ठेके खोले गए क्योंकि दारू इंटरनेट से नहीं पहुंचाई जा सकती उसको लेने जाना पड़ेगा या घर पहुँचाना पड़ेगा। तो खाना क्यों नहीं पहुंचाया जा सकता?

यहां यह समझना अनिवार्य है कि राजनीति के गर्भ से निकली राज्यव्यवस्था नीति बना सकती हैनियम बना सकती हैसड़क बना सकती हैमनुष्य को मनुष्य नहीं बना सकती और रंगकर्म मनुष्य को मनुष्य बनाता है। बिना राजनीति, राजनैतिक प्रक्रियाओं को समझे कैसे सत्ता से उपजे विष से मनुष्य को मुक्त किया जा सकता है? इसलिए जो राजनीति और रंगमंच के अन्तर्सम्बन्ध को नहीं जानता वो ‘रंगकर्मी’ नहीं है वो रंग दृष्टि शून्य मात्र एक नाचने गाने वाला हुनरमंद शरीर है. जो मात्र दरबारों की रंग नुमाइश होता है. सत्ता या पूंजीपतियों के दिल बहलाने वाला भोग हो सकते हैं. वो इस भोग से लोकप्रिय हो कर खूप पैसा कमा ख्यातिनाम हो सकते हैं पर रंगकर्मी नहीं हो सकते! जैसे बिना राजधर्म निभाए कोई लोकप्रियता की भीड़ से देश का प्रधानसेवक बन सकता है पर राजनीतिज्ञ नहीं बन सकता!

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सांस्कृतिक सृजनकार काल की पुकार! – मंजुल भारद्वाज

 



सांस्कृतिक सृजनकार काल की पुकार! – मंजुल भारद्वाज

देश और दुनिया आज सांस्कृतिक रसातल में है. तकनीक के बल पर संचार माध्यम में सारा विश्व लाइव है त्रासद यह है की तकनीक लाइव है आदमी मरा हुआ है. मरी हुए दुनिया को तकनीकी संचार लाइव कर रहा है. कमाल का विकास है व्यक्ति,परिवार,समाज, देश और दुनिया मरे हुए और तकनीक लाइव!
सवाल है आज कौन जिंदा है? हाँ हाडमांस के पुतले सांस ले रहे हैं पर क्या वो जिंदा हैं? जो सांस ले रहे हैं उनकी अवस्था क्या है? घरों में कैद,भूख,भय और भ्रम के जाल में फंसे हुए लोग क्या जिंदा होते हैं? लाखों लोग महामारी की वजह से सांस भी नहीं ले पा रहे और अकाल बैठ गए हैं मृत्यु की गोद में. अनजाने भय से ग्रस्त दुनिया आज मरी हुई रेंग रही है और तकनीक उसे लाइव बता रही है..हैं ना विकास का खिला हुआ कमल चेहरा!
जिंदा होने का अर्थ है भयमुक्त होना,विचार शील होना,विकारों से परे विवेक सम्मत होना. अपने विचार को साहस से व्यक्त करते हुए मानव कल्याण के लिए सत्य को खोजना. 21वीं सदी में जीवन यापन के सारे मुकाम हासिल करने के बाद भी दुनिया की यह हालत क्यों हुई? इस हालात की जड़ है लालच,वर्चस्ववाद और एकाधिकारवाद के लिए भूमंडलीकरण के नाम पर मनुष्य का वस्तुकरण, मनुष्य को उपभोग की सामग्री बनाकर ‘खरीदने और बेचने’ का विनाशकारी षड्यंत्र, जिसे ‘विकास’ के नाम से तकनीकी संचार से लाइव किया गया.
लाइव तकनीकी संचार ने सिर्फ़ 30 सालों में एक ऐसी पीढ़ी तैयार की जिसने विचार करने का मनुष्य कर्म आउटसोर्स कर दिया. यानी मनुष्य और प्राणी के फ़र्क को मिटा दिया. प्राणियों से मनुष्य को अलग करती है ‘विचार करने की क्षमता’ ! ‘विचार करने की क्षमता’ को खोकर केवल प्राणी बनना स्वीकार किया. प्राणी होने का मतलब है जिसके सारे निर्णय कोई और करे. ड्राइंग रूम में टीवी देखते हुए,मोबाइल पर भ्रमण करते हुए इन्टरनेट के माध्यम से अपनी जीवनयापन की जरूरत पूरी करने वाली दुनिया विचार करना भूल गई और एकाधिकारवाद के हाथों बिक गई. एकाधिकारवाद ने जीयो का भ्रम पैदाकर दुनिया को अपनी मुठ्ठी में कर लिया.अब एकाधिकारवाद दुनिया को अपनी मुठ्ठी में लेकर खेलता है,हसंता है और तकनीकी संचार से लाइव लाइव खेलता है और ज़ोर ज़ोर से जीयो जीयो मन्त्र का जप करता है.
एकाधिकारवाद का मतलब है विविधता का खात्मा! विविधता का खात्मा मतलब प्रकृति पर कब्ज़ा करने की हिमाक़त. उसी हिमाकत का प्रकृति आज उत्तर दे रही है.आज मनुष्य को जन्म देने वाली,पालने वाली प्रकृति उसके विरुद्ध खड़ी हो गई है और उसे लील रही है ... इसमें हाशिये पर रहने वाले पहले शिकार हो रहे हैं ..पर प्रकृति धीरे धीरे एकाधिकारवाद तक पहुँच रही है.
मनुष्य के इस पतन का कारण है उसकी सांस्कृतिक चेतना का मर जाना. इतिहास साक्ष्य है कोई कितना भी बलशाली,सिद्धहस्त,सर्वज्ञ व्यक्ति,समाज,सभ्यता या साम्राज्य रहा हो जब जब उसकी सांस्कृतिक चेतना भ्रमित हुई वो मिट गए. सांस्कृतिक चेतना “वो चेतना है जो मनुष्य को आंतरिक और बाहरी आधिपत्य से मुक्त कर उसके मूल्यों को उत्क्रांति के पथ पर उत्प्रेरित करती है और प्रकृति के साथ जीते हुए मनुष्य का एक स्वायत्त अस्तित्व बनाती है” पर विज्ञान को दफ़न कर उससे ईज़ाद तकनीक से एकाधिकारवाद ने प्रकृति से युद्ध का ऐलान कर दिया और पूरी मनुष्य संस्कृति को मटियामेट करने पर आमदा है ऐसे प्रलय काल में सांस्कृतिक सृजनकार ही दुनिया को बचा सकते हैं. जब पूरी राजनैतिक व्यवस्था बिक गई हो, धर्म पाखंड का अवतार ले महामारी काल में अस्पताल बनाने की बजाए अपनी सत्तालोलुता के लिए जनमानस में बसे भगवान के मंदिर का शिलान्यास कर,उनकी आध्यात्मिक संवेदनाओं से खेल रहा हो तब सांस्कृतिक सृजनकार ही समाज को उसकी मूर्छित अवस्था से जगा सकते हैं.
मनुष्य निरंतर परिवर्तन चाहता है. परिवर्तन की चाहत प्राकृतिक है. प्रकृति भी निरंतर परिवर्तित होती रहती है. मनुष्य के लिए आवश्यक है परिवर्तन को समझना.परिवर्तन एक ऐसी वर्तन प्रकिया है जो मनुष्य की हिंसा को अहिंसा, आत्महीनता को आत्मबल, विकार को विचार, वर्चस्ववाद को समग्रता, व्यक्ति को सार्वभौमिकता के प्राकृतिक न्याय और विविधता के सहअस्तित्व विवेक की ओर उत्प्रेरित करे!
कला हमेशा परिवर्तन को साधती है. क्योंकि कला मनुष्य को मनुष्य बनाती है. जब भी विकार मनुष्य की आत्महीनता में पैठने लगता है उसके अंदर समाहित कला भाव उसे चेताता है ... थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत अपने रंग आन्दोलन से विगत 28 वर्षों से देश और दुनिया में पूरी कलात्मक प्रतिबद्धता से इस सचेतन कलात्मक कर्म का निर्वहन कर रहा है. आज इस प्रलयकाल में थिएटर ऑफ़ रेलेवंस ‘सांस्कृतिक सृजनकार’ गढ़ने का बीड़ा उठा रहा है!
सत्य-असत्य के भान से परे निरंतर झूठ परोसकर देश की सत्ता और समाज के मानस पर कब्ज़ा करने वाले विकारी परिवार से केवल सांस्कृतिक सृजनकार मुक्ति दिला सकते हैं. सांस्कृतिक सृजनकार काल की पुकार!

मैं ढूंढ रहा हूँ उन साथियों को जिनके साथ में इस रंग अनुभव को साझा कर सकूं ! – मंजुल भारद्वाज

 



मैं ढूंढ रहा हूँ उन साथियों को जिनके साथ में इस रंग अनुभव को साझा कर सकूं ! – मंजुल भारद्वाज

26 नवम्बर,2019 को सांस्कृतिक चेतना को जागते हुए ‘सांस्कृतिक क्रांति’ का एक अविस्मरणीय अनुभव हुआ. रंग उर्जा का वो प्रवाह,वेग,तेज,सैलाब या बवंडर जो आप कहें वो मेरे मस्तिष्क में घनघना रहा है,उमड़ घुमड़ रहा है. ऐसा ही तो चाहा था 28 वर्ष पहले.. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस नाट्य सिद्धांत के सूत्रपात का उद्देश्य यही है ..जिसकी पूर्ति का यह प्रयोग रहा. बिना राजनैतिक पार्टी या चुनाव में सीधे हस्तक्षेप किया ..अपने रंगकर्म से राजनैतिक परिदृश्य में दखल दे सत्ता को बदल देने का अनोखा अनुभव बड़ा बैचेन कर रहा है. जहाँ कलाकार सत्ता का भांड या पेट भरने के रंगकर्म का उपयोग कर रहे हों ..वहां रंगकर्मी की औकात की वो सत्ता की धारा बदल दे ..अविश्वसनीय है ..पर सत्य है ..

मेरे इस फितूर से किसी को लेना देना नहीं है. दर्शकों ने, आयोजकों ने ..मीडिया ने नाटक की , लेखक- निर्देशक की , कलाकारों की बहुत तारीफ़ की. कलाकार भी अपने कर्म की दाद के बाद अपने जीवन में मस्त हैं.

मैं बैचैन हूँ की यह अनुभव किसको बताऊँ, किस रंगकर्मी में यह चेतना की मशाल जलाऊँ.. समाज का कौन सा वर्ग है जिसको मेरे अनुभव से कोई लेना देना है वो भी वर्चस्वादियों के शासन काल में.

मैं ढूंढ रहा हूँ उन साथियों को जिनके साथ में इस रंग अनुभव को साझा कर सकूं !

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एक सृजनकार का उद्देश्य होता है, उसकी रचनामें निहित उर्जास्पंदित होकर, पूरे समाज में रचना के ध्येय को स्पंदित करे. और जब ये उद्देश्य साकार होता है तब सृजनकार का व्यक्ति आह्लादित होकर प्रकृति की भांति सम हो जाता है. यही सम उसे सृजनकार बनाता है.

मैंने ऐसा ही महसूस किया 26 नवम्बर, 2019 को नाटक राजगतिके मंचन में. महाराष्ट्र के चुनाव परिणाम घोषित होने के बाद सत्ता की कवायद अपने षड्यंत्र के चरम पर थी. जबकि नाटक राजगतिराजनैतिक परिदृश्य को बदलने के लिए प्रतिबद्ध है. चुनाव के पहले जनता में संविधान सम्मत देश के मालिक होने का भाव नाटक राजगति ने जगाया था. वर्चस्व वादियों को उनका ठौर दिखा दिया था जनता ने.

सत्ता में वचन निभाना अनिवार्य होता है, ऐसा बोध सत्ता के लिए ही सही, पर राजनैतिक पार्टियों को भी हुआ. एक पार्टी विकारी पार्टी को छोड़ विचार की ओर आगे बढ़ी ... अलग अलग विचार का झंडा फहराने वाली सत्ता सुख भोगी पार्टियां भी खरखराते हुए होश में आई और सत्ता समीकरण का घटना क्रम हुबहू ऐसा चल रहा था जैसा नाटक राजगतिके मंच पर... एक-एक पल, संवाद, कलाकारों का सृजन स्पंदन और सृजनकार का राजनैतिक चिंतन दृष्टि आलेख रियल टाइम में रियल घटनाओं को स्पंदित कर रहा था. जिसका साक्षी था औरंगाबाद का गोविंदभाई श्राफ कॉलेज का ऑडिटोरियम. गोविंदभाई श्राफ कॉलेज के ऑडिटोरियम में दर्शकों ने राजगति की रंगसाधना से सत्ता, व्यवस्था, राजनैतिक चरित्र और राजनीति को अलग अलग राजनैतिक विचारधाराओं के माध्यम से विश्लेषित किया. विकार और विचार के संघर्ष को जीते हुए विचार धारा के प्रहार को भी सहन किया. थिएटर ऑफ़ रेलेवंस रंग सिद्धांत की इस अनूठी रंग अनुभूति को सभी दर्शकों ने वैचारिक असहमति के बावजूद स्वीकारा और वैचारिक असहमति के बिंदुओं पर निरंतर संवाद प्रक्रिया का संकल्प लिया.

आज लोकतंत्र की सबसे कमज़ोर कड़ी यानी  संख्याबल का फायदा उठाकर वर्चस्ववादी सत्ता के शीर्ष पर विराजमान हैं, जिनके आतंक के सामने पत्रकार पत्तलकार हो चारण हो गए, जनता विकल्पहीन भेड़ और कलाकार जयकारा लगाने वाली भीड़ बन गए. ऐसे समय में सत्ता के अंधे बीहड़ में दृष्टिहीन धृतराष्ट्र को राजनैतिक विवेकका दीया दिखाने का कर्म आत्मघाती है. पर इस चुनौती का थिएटर ऑफ़ रेलेवंस के प्रतिबद्ध कलाकारों ने बखूबी सामना किया और राजगति नाटक के मंचन से जनता के राजनैतिक विवेक को जगाया.

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#मंजुलभारद्वाज #रंगकर्म

 

 

Manjul Bhardwaj’s new Marathi Play ‘Lok-Shastra Savitri ' the Yalgar of Samta !

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