Sunday, October 23, 2016

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में- भाग - 5.. आज का नाटक है “मैं औरत हूँ!”

नाटक – “मैं औरत हूँ !” – अपने होने , उसको स्वीकारने और अपने ‘अस्तित्व’ को विभिन्न रूपों में  खंगोलने,अन्वेषित करने की यात्रा है . नाटक ‘मैं औरत हूँ!’ पितृसत्तात्मक भारतीय समाज की सोच , बधनों , परम्पराओं , मान्यताओं को सिरे से नकारता है और उससे खुली चुनौती देकर अपने ‘स्वतंत्र मानवीय अस्तित्व’ को स्वीकारता है . नाटक महिला को पुरुष की बराबरी के आईने में नहीं देखता अपितु ‘नारी’ के अपने ‘स्वतंत्र मानवीय अस्तित्व’ को रेखांकित और अधोरेखित करता है .

ये नाटक ‘कलाकार और दर्शकों’ के लिए आत्म मुक्तता का माध्यम है . नाटक में अभिनय करते हुए ‘जेंडर समानता’ की संवेदनशीलता से कलाकार रूबरू होतें हैं और नाटक देखते हुए ‘दर्शक’ ‘जेंडर बायस’ से मुक्त होते हैं . नाटक ‘मैं औरत हूँ’ कलाकार और दर्शक पर अद्धभुत प्रभाव छोड़ता है . ‘नारी’ मुक्ति का बिगुल बजा उसे अपने ‘अधिकार’ के लिए संघर्ष करने को प्रेरित कर ‘सक्षम’ करता है . इस नाटक की लेखन शैली अनोखी है . ‘नारी विमर्श’ पर लिखे इस नाटक को एक कलाकार भी परफ़ॉर्मर कर सकती है / सकता है और अनेक कलाकार भी .. इस नाटक की ‘हिंदी’ के अलावा अलग –अलग भाषाओँ में देश भर में हजारों प्रस्तुतियां हो चुकी हैं और निरंतर हो रही हैं ...














सबसे दिलचस्प बात ये है की बिना अपना हुलिया बदले पुरुष कलाकारों ने महिला दर्शकों से खचाखच भरे नाट्यगृह में इस नाटक को मंचित किया और ‘दर्शकों’ को नाटक की ‘आत्मा’ से जोड़ा . महिला कलाकार तो इस नाटक की ‘आत्मा को झकझोर’ देने वाली कलात्मक प्रस्तुतियों से ‘दर्शकों’ को ‘जेंडर समानता’ के लिए उत्प्रेरित करती हैं !

प्रथम मंचन : 11 अप्रैल  , 1998

उम्मीद है आप सब को रंग साधना के यह पड़ाव नई रंग प्रेरणा दे पाएं...
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“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन वैश्विक स्तर पर कर रहे हैं. “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “रंग सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म ‘निर्देशक और अभिनेता केन्द्रित होने की बजाय “दर्शक और लेखक केन्द्रित हो क्योंकि दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है.
पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए “कला – कला के लिए” के चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं . “ थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ ने “कला – कला के लिए” वाली औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के चक्रव्यहू को अपने तत्व और सार्थक प्रयोगों से तोड़ा (भेदा) है और “दर्शक” को जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने वाली प्रतिबद्ध ,प्रगतिशील,समग्र और समर्पित रंग दृष्टि से जोड़ा है .
“
थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ अपने तत्व और सकारात्मक प्रयोगों से एक बेहतर , सुंदर और मानवीय विश्व के निर्माण के लिए सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध है !

Friday, October 14, 2016

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में- भाग - 4.. आज का नाटक है “नपुंसक”

नाटक – नपुंसक एक सामाजिक एवम राजनैतिक व्यंग है. समाज की विषमता और असमानता पर गहरा प्रहार है . पितृसत्तात्मक समाज में तृतीय लिंग की सामाजिक अस्वीकार्यता पर कटाक्ष करते हुए तृतीय लिंगी जीवन के दुःख , दर्द और पीड़ा को उजागर कर मनुष्य में ‘इंसानियत’ का ज़ज्बा जगाता है.
NAPUNSAK:
A socio – political satire through the life of eunuch
प्रथम मंचन – 9 मार्च,1998  
नाटक – नपुंसक मूलतः रंग समीक्षक मित्रों के आग्रह पर लिखा गया . जनसत्ता के मुम्बई संस्करण में कला सम्पादक  राकेश श्रीमाल एक नई ‘रंग मंचीय’ पहल करना चाहते थे जिसके लिए एक नाट्य उत्सव आयोजित किया ‘नट आलाप’. नाटक – ‘नपुंसक’ के मंचन से ‘नट आलाप’ का प्रारम्भ हुआ और नए रंग विमर्श की शुरुआत हुई ! इस नाटक ने  रंग जगत में कई नामी गिरामी लेखकों और निर्देशकों को इस विषय पर नाटक खेलने के लिए प्रेरित किया . कई फिल्में भी बनी ... आज ये नाटक देशभर में विभिन्न रंग मण्डलियों और कलाकारों द्वारा मंचित हो रहा है !

 

नोट - ताजरंग महोत्सव में नाटक नपुंसक का मंचन करेगी इप्टा

चाईबासा : भारतीय जननाट्य संघ चाईबासा शाखा, नटरांजलि आगरा की ओर से आयोजित ताजरंग महोत्सव 2016 में अपनी बहुचर्चित नाटक नपुंसक का मंचन करेगी। विदित हो की मंजुल भारद्वाज की ओर से लिखित यह नाटक किन्नरों के अपने दर्द को उभारकर दर्शकों को अहसास कराने में सक्षम है। नाटक के जरिए समाज में मरते इंसानियत और व्याप्त बुराईयों पर एक व्यंग्यात्मक कटाक्ष किया गया है। जो समाज में मुखौटों के पीछे छुपे उन चेहरों को उजागर करता है जो सामाजिक संरचना का खोखला ढांचा तैयार करते हैं। निश्चित तौर पर इस नाटक के जरिए इप्टा चाईबासा के रंगकर्मी एक और अभेद्य दुर्ग को ढहाने का प्रयास ताजरंग महोत्सव में करेंगे।

Publish Date:Mon, 08 Feb 2016 12:45 AM (IST) | Updated Date:Mon, 08 Feb 2016 12:45 AM (IST) – जागरण

 












उम्मीद है आप सब को रंग साधना के यह पड़ाव नई रंग प्रेरणा दे पाएं...
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“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन वैश्विक स्तर पर कर रहे हैं. “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “रंग सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म ‘निर्देशक और अभिनेता केन्द्रित होने की बजाय “दर्शक और लेखक केन्द्रित हो क्योंकि दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है.
पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए “कला – कला के लिए” के चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं . “ थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ ने “कला – कला के लिए” वाली औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के चक्रव्यहू को अपने तत्व और सार्थक प्रयोगों से तोड़ा (भेदा) है और “दर्शक” को जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने वाली प्रतिबद्ध ,प्रगतिशील,समग्र और समर्पित रंग दृष्टि से जोड़ा है .
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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ अपने तत्व और सकारात्मक प्रयोगों से एक बेहतर , सुंदर और मानवीय विश्व के निर्माण के लिए सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध है !

Sunday, October 9, 2016

Theatre of Relevance (TOR) in English Media - A Glimpse




















Theatre of Relevance (TOR) is a philosophy initiated & practiced by well known Theatre personality Manjul Bhardwaj since 12 August, 1992 in India and all over the world. Theatre of Relevance envisages audience as first, foremost & strongest theatre person and then writer, director, performer follows. TOR brings out theatre from the cocoons of Entertainment to a way of empowerment and sees theatre as a way of living. TOR has proved that theatre is a process of constructive change and a volcano of revolution with its experiments all over the world. TOR rubbishes capitalistic approach “art for art sake” as escapist & opportunistic and commits it`s creative excellence to make the world more “Better & Humane”.

Saturday, October 8, 2016

“थिएटर ऑफ़ रेलेवंस” नाट्य सिद्धांत पर आधारित लिखे और खेले गए नाटकों के बारे में- भाग - 3.. आज का नाटक है “द्वंद्व”

नाटक – “द्वंद्व” घरेलू हिंसा के कुचक्र में उलझे हुए पति ,पत्नी ,बच्चों ,पड़ोसियों और समाज की परिस्थितियों से रूबरू होता है नाटक “द्वंद्व” 1000 से ज्यादा बार नुक्कड़ और मंच पर प्रस्तुत !

प्रथम मंचन – 31 जुलाई , 1994

DWANDWA: The play written & directed by Manjul Bhardwaj
The Indian woman is either venerated, as a goddess or else pitied as a long –suffering victim figure. Despite the undeniable advent of more progressive attitudes towards gender roles in recent times, the oppression of women persists in subtle and not so- subtle ways. This play explores the issue of domestic violence the way in which the woman at home often finds herself in a far vulnerable position than in a hostile external world. This play has been performed more than 1000 times on stage and street.

जब घरेलु हिंसा केवल निजी और पारिवारिक दायरे का मुद्दा समझा जाता था ऐसे समय में ‘आधी आबादी’ की न्याय संगत और इंसानी ह्क्कुक की आवाज़ को आवाज़ दी नाटक “द्वंद्व” ने. भारतीय समाज के संस्कार,परम्परा और पितृसत्तात्मक नज़रिए की ‘घरेलू हिंसा’ को मौन सहमति  को अपनी प्रभावी प्रस्तुतियों से जनता के बीच जाकर तोड़ा . नाटक की प्रस्तुतियों में , मंचन के बाद जनता से खुला संवाद किया ... हिंसा से पीड़ित महिलाओं को हौंसला दिया और उन्होंने अपने दर्द को सरेआम बयाँ किया .. जनता में, बस्तियों में, बिल्डिंगों में,सोसायटियों में, घरों में इस विषय पर संवाद कायम किया . घर के सदस्यों में संवाद कायम हुआ और परिवार ‘हिंसा’मुक्त हुए !











उम्मीद है आप सब को रंग साधना के यह पड़ाव नई रंग प्रेरणा दे पाएं

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“थिएटर ऑफ रेलेवेंस” नाट्य सिद्धांत का सूत्रपात सुप्रसिद्ध रंगचिंतक, "मंजुल भारद्वाज" ने 12 अगस्त 1992 में किया और तब से उसका अभ्यास और क्रियान्वयन वैश्विक स्तर पर कर रहे हैं. “थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “रंग सिद्धांत के अनुसार रंगकर्म ‘निर्देशक और अभिनेता केन्द्रित होने की बजाय “दर्शक और लेखक केन्द्रित हो क्योंकि दर्शक सबसे बड़ा और शक्तिशाली रंगकर्मी है.
पूंजीवादी कलाकार कभी भी अपनी कलात्मक सामाजिक जिम्मेदारी नहीं लेते इसलिए “कला – कला के लिए” के चक्रव्यहू में फंसे हुए हैं और भोगवादी कला की चक्की में पिस कर ख़त्म हो जाते हैं . “ थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ ने “कला – कला के लिए” वाली औपनिवेशिक और पूंजीवादी सोच के चक्रव्यहू को अपने तत्व और सार्थक प्रयोगों से तोड़ा (भेदा) है और “दर्शक” को जीवन को बेहतर और शोषण मुक्त बनाने वाली प्रतिबद्ध ,प्रगतिशील,समग्र और समर्पित रंग दृष्टि से जोड़ा है .
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थिएटर ऑफ़ रेलेवंस “ अपने तत्व और सकारात्मक प्रयोगों से एक बेहतर , सुंदर और मानवीय विश्व के निर्माण के लिए सांस्कृतिक चेतना का निर्माण कर सांस्कृतिक क्रांति के लिए प्रतिबद्ध है !

Manjul Bhardwaj’s new Marathi Play ‘Lok-Shastra Savitri ' the Yalgar of Samta !

  Manjul Bhardwaj’s new Marathi Play ‘Lok-Shastra Savitri ' the Yalgar of Samta ! - Kusum Tripathi When I received a call from my old fr...